सोमवार, 16 मई 2011


अनेक रोग नाशक भी है पपीता

पपीता एक ऐसा मधुर फल है जो सस्ता, सपरिचित एवं सर्वत्र सुलभ है। यह फल प्राय: बारहों मास पाया जाता है। किन्तु फरवरी से मार्च तथा मई से अक्तूबर के बीच का समय पपीते की ऋतु मानी जाती है। कच्चा पपीता हरे रंग का तथा पकने पर पीले रंग का हो जाता है। कच्चे पपीते में विटामिन ‘ए’ तथा पके पपीते में विटामिन ‘सी’ की मात्रा भरपूर पायी जाती है।
आयुर्वेद में पपीता (पपाया) को अनेक असाध्य रोगों को दूर करने वाला बताया गया है। संग्रहणी, आमाजीर्ण, मन्दाग्नि, पाण्डुरोग (पीलिया), प्लीहा वृध्दि, बन्ध्यत्व को दूर करने वाला, हृदय के लिए उपयोगी, रक्त के जमाव में उपयोगी होने के कारण पपीते का महत्व हमारे जीवन के लिए बहुत अधिक हो जाता है।
पपीते के सेवन से चेहरे पर झुर्रियां पड़ना, बालों का झड़ना, कब्ज, पेट के कीड़े, वीर्यक्षय, स्कर्वी रोग, बवासीर, चर्मरोग, उच्च रक्तचाप, अनियमित मासिक धर्म आदि अनेक बीमारियां दूर हो जाती है। पपीते में कैल्शियम, फास्फोरस, लौह तत्व, विटामिन- ए, बी, सी, डी प्रोटीन, कार्बोज, खनिज आदि अनेक तत्व एक साथ हो जाते हैं। पपीते का बीमारी के अनुसार प्रयोग निम्नानुसार किया जा सकता है।
१) पपीते में ‘कारपेन या कार्पेइन’ नामक एक क्षारीय तत्व होता है जो रक्त चाप को नियंत्रित करता है। इसी कारण उच्च रक्तचाप (हाई ब्लड प्रेशर) के रोगी को एक पपीता (कच्चा) नियमित रूप से खाते रहना चाहिए।
२) बवासीर एक अत्यंत ही कष्टदायक रोग है चाहे वह खूनी बवासीर हो या बादी (सूखा) बवासीर। बवासीर के रोगियों को प्रतिदिन एक पका पपीता खाते रहना चाहिए। बवासीर के मस्सों पर कच्चे पपीते के दूध को लगाते रहने से काफी फायदा होता है।
३) पपीता यकृत तथा लिवर को पुष्ट करके उसे बल प्रदान करता है। पीलिया रोग में जबकि यकृत अत्यन्त कमजोर हो जाता है, पपीते का सेवन बहुत लाभदायक होता है। पीलिया के रोगी को प्रतिदिन एक पका पपीता अवश्य खाना चाहिए। इससे तिल्ली को भी लाभ पहुंचाया है तथा पाचन शक्ति भी सुधरती है।
४) महिलाओं में अनियमित मासिक धर्म एक आम शिकायत होती है। समय से पहले या समय के बाद मासिक आना, अधिक या कम स्राव का आना, दर्द के साथ मासिक का आना आदि से पीड़ित महिलाओं को ढाई सौ ग्राम पका पपीता प्रतिदिन कम से कम एक माह तक अवश्य ही सेवन करना चाहिए। इससे मासिक धर्म से संबंधित सभी परेशानियां दूर हो जाती है।
५) जिन प्रसूता को स्तनों में दूध कम बनता हो, उन्हें प्रतिदिन कच्चे पपीते का सेवन करना चाहिए। सब्जी के रूप में भी इसका सेवन किया जा सकता है। इससे स्तनों में दूध की मात्रा अधिक उतरने लगती है।
६) सौंदर्य वृध्दि के लिए भी पपीते का इस्तेमाल किया जाता है। पपीते को चेहरे पर रगड़ने से चेहरे पर व्याप्त कील मुंहासे, कालिमा व मैल दूर हो जाते हैं तथा एक नया निखार आ जाता है। इसके लगाने से त्वचा कोमल व लावण्ययुक्त हो जाती है। इसके लिए हमेशा पके पपीते का ही प्रयोग करना चाहिए।
७) कब्ज सौ रोगों की जड़ है। अधिकांश लोगों को कब्ज होने की शिकायत होती है। ऐसे लोगों को चाहिए कि वे रात्रि भोजन के बाद पपीते का सेवन नियमित रूप से करते रहें। इससे सुबह दस्त साफ होता है तथा कब्ज दूर हो जाता है।
८) समय से पूर्व चेहरे पर झुर्रियां आना बुढ़ापे की निशानी है। अच्छे पके हुए पपीते के गूदे को उबटन की तरह चेहरे पर लगायें। आधा घंटा लगा रहने दें। जब वह सूख जाये तो गुनगुने पानी से चेहरा धो लें तथा मूंगफली के तेल से हल्के हाथ से चेहरे पर मालिश करें। ऐसा कम से कम एक माह तक नियमित करें।
९) नए जूते-चप्पल पहनने पर उसकी रगड़ लगने से पैरों में छाले हो जाते हैं। यदि इन पर कच्चे पपीते का रस लगाया जाए तो वे शीघ्र ठीक हो जाते हैं।
१०) पपीता वीर्यवर्ध्दक भी है। जिन पुरुषों को वीर्य कम बनता है और वीर्य में शुक्राणु भी कम हों, उन्हें नियमित रूप से पपीते का सेवन करना चाहिए।
११) हृदय रोगियों के लिए भी पपीता काफी लाभदायक होता है। अगर वे पपीते के पत्तों का काढ़ा बनाकर नियमित रूप से एक कप की मात्रा में रोज पीते हैं तो अतिशय लाभ होता है

यह चमत्कारी गोला बन जाएगा मधुमेह का 'काल'!

एक अमेरिकी चकित्सक ने गहन खोजों से साबित किया है कि नारियल तेल का नियमित सेवन करने से मधुमेह रोगियों कि सभी समस्याएं सुलझ सकती हैं। वास्तव में मधुमेह के रोगी के कोश इंसुलिन रेजिस्टेंट हो जाते हैं और इंसुलिन को ग्रहण न करने के कारण ग्लूकोज़ या शर्करा को ऊर्जा में परिवर्तित नहीं कर पाते। ऊर्जा या आहार के अभाव में रोगी के कोश मरने लगते हैं। यही कारण है कि मधुमेह रोगी को कोई भी अन्य रोग होने पर खतरनाक स्थिति बन जाती है, क्योंकि उसके कोश तो आहार के अभाव में पहले ही मर रहे होते हैं ऊपर से नए रोग के कारण मरने वाले कोशों कि भरपाई का काम आ जाता है जो कि शारीर का दुर्बल तंत्र करने में समर्थ नहीं हो पाता। ऐसे में नारियल का तेल सुनिश्चित समाधान के रूप में काम करता है।

उपयोग विधि

चिकित्सा के लिए एक दिन में लगभग 45 मी.ली. नारियल तेल का प्रयोग किया जाना चिहिए जो कि शुरुआत में किसी के लिये भी थोड़ा कठिन हो सकता है। इसलिये शुरुआत केवल एक चम्मच से करते हुए धीरे-धीरे मात्रा बढानी चाहिए अन्यथा पाचन बिगड़ सकता है। दाल, सब्जी में तड़के के रूप में इसका प्रयोग किया जा सकता है।

सावधानी 

किसी प्राकृतिक या आयुर्वेद चिकित्सक की देख रेख में प्रयोग करना अधिक उत्तम होगा।

रविवार, 15 मई 2011

देशी नुस्खा जो मंहगी दवाओं से कई कदम आगे है!!

खांसी की समस्या एक आम समस्या है। हर कोई अपनी जिंदगी में कई बार खांसी समस्या से परेशान होता है। बुखार से तो फिर भी इंसान हिम्मत के दम पर झूझता रह सकता है लेकिन सर्दी-खांसी से व्यक्ति इतना बेहाल हो जाता है कि वह किसी काम को करने के लायक ही नहीं बचता। वर्तमान में सर्वाधिक प्रचलित ऐलापैथिक चिकित्सा पद्धति में खांसी को भगाने के लिये ढेरों-ढेर दवाइयां मौजूद हैं लेकिन जानकारों की माने तो ये दवाइयां खांसी को तो रोक देती हैं किन्तु दूसरी कई अन्य समस्याओं को पैदा कर सकती है। इसीलिये यहां हम लाएं हैं आयुर्वेद से खोज कर एक ऐसा प्रयोग लाएं हैं जो बेहद आसान होते हुए भी 100 फीसदी कारगर है....

काली मिर्च का पाउडर मुनक्का दाख के साथ लपेट लें। काली मिर्च से लिपटी हुईं मुनक्का दाखों को तवे पर थोड़े से शुद्ध देसी घी के साथ हल्की आंच पर सेक लें। पर्याप्त सिकी हुई मुनक्का को दो-दो की संख्या में मुंह में रखकर चूंसते रहें। आप देखेंगे कि कुछ ही घंटों में आपकी खांसी जड़ से मिट चुकी है।

रिकार्डतोड़ गरमी में कैसे रहें आइस कूल


धीरे-धीरे गर्मी का मौसम अपने चरम पर पहुंचने लगा है। प्रकृति के संतुलन के लिये गर्मी का सीजन चाहे कितना भी जरूरी हो लेकिन इतना तो तय है कि ठंड़ और बरसात की तरह गर्मी को सायद ही कोई पसंद करता हो। फिर गर्मी को सहना सभी के लिए काफी मुश्किल भी होता है। लेकिन चिंता न करें इसका भी तोड़ यानी अचूक उपाय मौजूद है। इसका उपाय है योग मुद्रा। योग मुद्रा के द्वारा हम हमारे शरीर का तापमान वातावरण के अनुसार रखकर इस चिलचिलाती गर्मी के असर को कम कर सकते हैं। रोज सुबह-सुबह 10-15 मिनिट निम्न मुद्रा को करें, दिनभर शरीर में ठंडक बनी रहेगी। इस मुद्रा को काकी मुद्रा कहते हैं।

मुद्रा करने की विधि

किसी शांत और शुद्ध वातावरण वाले स्थान पर कंबल या आसन बिछाकर पद्मासन में बैठ जाएं। फिर होठों को पतली सी नली के रूप में मोड़कर कौए की चोंच जैसा आकार बना लें। इसके बाद अपना पूरा ध्यान नाक के आगे के भाग पर लगाएं। अब मुंह से धीरे-धीरे गहरी सांस लेकर होठों को बंद कर लें और सांस को नाक से बाहर छोड़े। इस क्रिया को कम से कम 10 मिनिट तक करें।

इस क्रिया के लाभ

काकी मुद्रा करने से श्वास संबंधी कई बीमारियां दूर होती हैं और हम इन बीमारियों से हमेशा बचे रहते हैं। इससे होठों की सुंदरता बढ़ती है। इसमें मुंह से अंदर जाने वाली हवा का संपर्क मुंह की दीवारों से होता है। इस मुद्रा को करने से शरीर से बहुत से रोग दूर हो जातें है। इस मुद्रा के निरंतर अभ्यास से अम्लपित्त का बढऩा कम हो जाता है। इससे हमारा पाचन तंत्र सुचारू रूप से कार्य करता है और कई पेट संबंधी बीमारियां नहीं होती हैं।

शुक्रवार, 13 मई 2011

अनेक रोगों की असरकारक दवा इमली

पुरानी इमली बहुत ही गुणकारी होती है। सूखी पुरानी इमली संदीपक, भेदक, हल्की, हृदय के लिये हितकारी, कफ एवं वात रोगों में पथ्यकारी तथा कृमिनाशक होती है। इसके बीज संग्रहणी, अतिसार, रक्तार्श, सोमरोग, प्रदर, प्रेमह, बिच्छू आदि विषैले जीवों के काटने के दर्द में उपयोगी है। इमली को हमेशा पानी में कांच या मिट्टी के पात्र में ही भिंगोना चाहिये, तांबा, पीतल, कांसा या लोहे के पात्र में कभी नहीं। इमली के कुछ विशेष उपयोग इस प्रकार है :-
कब्ज : बहुत पुरानी इमली का शर्बत बनाकर पीने से कब्ज दूर होती है।
खाज-खुजली :- इमली के बीज नींबू के रस में पीसकर लगाने से खाज दूर होती है।
लू लगना :- गर्मी में एकदम बाहर निकलने से शरीर का जलीयांश शुष्क होकर तीव्र ज्वर हो जाता है। इसे लू लगना कहते हैं। इससे बचने के लिये लू के समय बाहर निकलने पर इमली का शर्बत पी लेने पर लू की आशंका नहीं रहती।
स्वप्नदोष : इमली के बीजों को चौगुने दूध में भिंगोकर रख दें। दो दिन बाद छिलका निकालकर पीस लें। प्रतिदिन सुबह-शाम सेवन इसका करने से धातु पुष्ट होती है और स्वप्नदोष दूर होता है।
नपुंसकता : इमली के बीजों की गिरी, वटजटा, सिंघाड़ा, तालमखाना, कमरकस, कतीरागोंद, बबूल का गोंद, बीजबंद, समुद्रदोष, तुख्यमलंगा, कौंच के बीच, रीठे की गिरी, छोटी इलाइयची प्रत्येक को 10-10 ग्राम की मात्रा में लेकर बारीक चूर्ण बना लें और समभाग मिश्री की चाशनी मिलाकर जमा दें। सुबह-शाम 6-6 माशा सेवन करने से और ऊपर से गाय का दूध पीने से वीर्यहीनता, स्वप्नदोष, शीघ्रपतन मिटकर नपुंसकता दूर होती है।
श्वेद प्रदर : बिना ऋतुकाल स्त्री की योनि से सफेद, लाल नीला, पीला स्राव होता रहे तो यह प्रदर रोग समझना चाहिये। अप्राकृतिक भोजन, अजीर्ण, अतिमैथुन, गर्भस्राव, क्रोध, शोक, चिंता ज्यादा चटपटे पदार्थों के सेवन आदि से यह रोग होता है। यह रोग कई प्रकार का होता है। इससे स्त्री का शरीर दिनों दिन कमजोर और रक्तहीन होता चला जाता है। इससे बचने के लिये लोहे की छोटी कड़ाही या तवे पर थोड़ी रेत डालकर चूल्हे पर चढ़ाकर खूब गर्म करें। बाद में इमली के बीज इसमें डाल दें और कड़छी चलाते रहें। अधभुने हो जाने पर गर्म दशा में ही इनके छिलके निकाल लें।
बीजों को लोहे के हमामदस्ते में अच्छी तरह पीसकर चूर्ण बना लें। इस चूर्ण के वजन के बराबर मिश्री या शक्कर मिला लें। प्रात: सायं 1-2 तोले की मात्रा में गाय के दूध के साथ या पानी से कुछ दिन लगातार सेवन करने से श्वेत प्रदर का रोग समाप्त हो जाता है।
सांप का विष : इमली के बीजों को पत्थर पर थोड़े जल में घिसकर रख लें। सांप के काटे हुए स्थान पर ब्लेड से चीरकर दबाकर वहां से काला रक्त निकालकर घिसे हुए बीजों को एक-दो बीज की मात्रा में चिपका दें। ये बीज विष चूसना आरंभ कर देंगे। थोड़ी-थोड़ी देर बाद बीज बदलते रहें और बदले हुए बीजों की जमीन में गाड़ दें। बीज उस समय तक बदलते रहें, जब तक कि पूरा विष न उतर जाए।

विश्राम भी उतना ही जरूरी है जितना काम

माना कि काम हमारे लिए बहुत जरूरी है। काम नहीं करेंगे तो आजीविका भी नहीं कमा पाएंगे। मगर शरीर से काम लेने के लिए विश्राम भी अत्यन्त आवश्यक है ताकि शरीर थकावट दूर कर फिर से काम करने योग्य हो सके। शरीर से लगातार काम नहीं लिया जा सकता। प्रयोग में लाई शक्ति की क्षतिपूर्ति जरूरी है।
* जब भी विश्राम करना हो, निश्चित, एकांत ढूंढ़ें। शोर-शराबे से दूर रहें।
* विश्राम के समय शरीर को पूरी तरह ढीला छोड़ दें, तनाव रहित। अपनी थकान को ध्यान में रखकर विश्राम का समय तय करें।
* खाली मस्तिष्क होगा तो मानसिक थकान जल्दी दूर कर लेंगे।
* गर्मी में, दोपहर के भोजन के बाद आराम करें। थोड़ी देर सोएं। सर्दी में दोपहर के भोजन के बाद सोन नहीं चाहिए। आलस्य आ जाएगा।
* सोने का पूरा कमरा तथा बिस्तर साफ सुथरे हों। आंखों पर रोशनी तथा कानों में शोर नहीं पड़ना चाहिए। सोना समय मुंह न ढंकें।
* खाना खाने के तुरंत बाद नहीं सोना चाहिए। दो घंटे का गैप रखें।
* किसी एक करवट न सोएं। पीठ या पेट के बल भी नहीं। दांयी करवट से सोना शुरू करें।
* आराम करते समय या विश्राम करते समय अपनी समस्याओं को झटक दें। दिमाग को खाली रखें। वरना थकावट बढ़ जाएगी।
* जब कार्यों के कारण विशेष हालात हों और खूब थक जाएं तो ऐसे में देश, काल, समय, स्थान, किसी भी बात, परवाह न करें, शरीर को विश्राम दें।
* सोते समय विशेषकर ध्यान रखेंकि वस्त्र ढीले हो। तंग न हो। नहीं तो विश्राम नहीं कर पाएंगे। अच्छी नींद नहीं ले सकेंगे।
* सिंगल पलंग पर एख ही को या उबल बैंड पर दो को ही सोन चाहिए। नहीं तो बेआरामी बनी रहेगी। शरीर चुस्त नहीं रह पाएगा।

यौवन व सौन्दर्य तेजी से बढ़ता है इससे

इंसान अपने पूरे जीवन में जो भी महत्वपूर्ण या महान कार्य करता है, वह ज्यादातर युवापन में ही कर पाता है। क्योंकि उम्र की इस अवस्था में कोई भी व्यक्ति तन-मन की अधिकांश ऊर्जायों या शक्तियों से भरा हुआ होता है। इसलिये अगर कोई लंबे समय तक जवान रहने के लिये प्रयास करता है तो इसे अनुचित नहीं कहा जा सकता। जवानी के साथ ही सुन्दरता भी कुदरत की एक ऐसी ही नियामत है जो व्यक्ति को आत्मविश्वास से भरपूर रखती है। तो चलते हैं एक ऐसी बेहद आसान योगिक क्रिया की और जिससे आपकी जवानी लंबे समय तक कायम रहेगी साथ ही खूबसूरती में भी वांक्षित इजाफा होगा....

बकासन एक ऐसा आसान आसन है जिसमें हमारे शरीर की अवस्था बगुले के जैसी हो जाती है, इसी वजह से इसे बकासन कहा जाता है। इस आसन से हमारे शरीर की आंतरिक और बाह्य शक्ति में गुणोत्तर वृद्धि होती है। कुछ ही दिनों में इस आसन के लाभ नजर आने लगते हैं।

बकासन की विधि

समतल पर स्थान पर कंबल आदि बिछाकर बैठ जाएं। अब दोनों हाथों को अपने सामने भूमि पर रखें। सांस सामान्य रखें। दोनों घुटनों को हाथों की कोहनियों पर स्थिर कीजिएं। सांस अंदर की ओर लेते हुए शरीर का पूरा भार धीरे-धीरे हथेलियों पर आने दें और अपना शरीर ऊपर की ओर उठा लें। यह आसन काफी कठिन है परंतु निरंतर अभ्यास होने पर आसन की पूर्ण अवस्था प्राप्त की जा सकती है। परंतु ध्यान रखें यदि आपके हाथों में कोई परेशानी या बीमारी हो तो यह आसन ना करें।

बकासन के लाभबकासन में हमारे शरीर का पूरा भार हाथों पर होता है अत: इस आसन से हमारे हाथों के स्नायुओं को विषेश बल एवं आरोग्य मिलता है। मुख की कान्ति बढ़ती है। सुंदरता में आश्चर्यजनक बढ़ोतरी होती है। जवानी बनी रहती है। शरीर हष्ट-पुष्ट बना रहता है। इस आसन को निरंतर करने से शरीर की कई छोटी-छोटी बीमारियां हमेशा दूर रहती है।

सावधानियां

किसी अनुभवी या जानकार योग प्रशिक्षक की देख-रेख में ही इस आसन का अभ्यास करें। शरीर के साथ किसी भी प्रकार की जोर जबरदस्ती नुकसानदेह भी हो सकती है।

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