सोमवार, 23 मई 2011

चैन की नींद के लिए

चैन की नींद न आती हो, तो सिरहाने की तरफ कपूर जलाकर "" का गुंजन करें l सुबह -शाम जलाने से वायु दोष दूर होगा, लक्ष्मी प्राप्ति होगी, बुरे सपने नहीं आयेंगे l 

बेल से घरेलू उपचार


बिल्वफल अर्थात् बेल का मूल वतन भारत ही है। अति प्राचीन काल से इसकी गणना औषधि के रूप में होती आ रही है। आकार की दृष्टि से यह गोल कैथ (कपित्थ) से मिलता-जुलता है। यह साधारण गेंद के समान होता है। हिमालय की तराई, मध्य एवं दक्षिण भारत, बिहार, बंगाल आदि प्रान्तों में बेल के वृक्ष बहुतायत मात्रा में पाये जाते हैं।


बिल्व का गूदा, पत्ता, जड़, छाल आदि औषधि के लिए उपयोगी माना जाता है। छोटे कच्चे बेल के फल को छीलकर, गोल-गोल कतरेनुमा टुकड़े काटकर सुखाकर मुखरबंद डिब्बों में संग्रह करके रखा जाता है। इसका उपयोग वैद्य लोग सालों भर तक औषधि के रूप में किया करते हैं। प्रयोग हेतु जंगली फलों का ही संग्रह करके रखा जाना उत्तम माना जाता है।
सेवन की दृष्टि से बेल का चूर्ण तीन ग्राम से छह ग्राम तक ही लेना उचित होता है। रस एक तोला से एक ग्राम तक ही सेवनीय होता है।

औषधीय प्रयोग : बिल्वपत्र के औषधीय गुणों का कारण उसमें स्थित ‘टॉनिन’ होता है। पाचन की तकलीफों और पुरानी पेचिश के लिए बिल्वफल के रस के समान अन्य कोई उपाय नहीं होता। इसका रस पौष्टिक होता है तथा रक्त विकार को भी दूर करता है।
बेल आमातिसार (बादी दस्त) तथा खूनी दस्त (रक्तातिसार) की अचूक औषधि है। दस्त, संग्रहणी (पेचिश), गर्भवती का वमन, बच्चों के दांत निकलते समय का दस्त, कब्ज, समज्वर, रक्तहीनता (एनीमिया), बहुमूत्र, प्रदर (ल्यूकोरिया), हैजा, मस्तिष्क की गर्मी, नपुंसकता, कुकर खांसी, फोड़ा, कंठमाला, रतौंधी, बहरापन, वायु गोला आदि का सफल चिकित्सक हैं। मच्छर-मक्खी भगाने के लिए भी बेल एक सस्ती दवा है।
रक्तहीनता का प्रयोग ः कमजोरी की अवस्था में खून की मात्रा शरीर में कम होने पर बेलगिरी का चूर्ण 5 ग्राम चीनी मिले हुए दूध के साथ दिन में चार बार तक खाने से एनीमिया दूर होता है।
बहुमूत्र पर प्रयोग : पेशाब के जल्दी-जल्दी आने पर दस ग्राम बेलगिरी और पांच ग्राम सोंठ को 

कूटकर रख लें। चार सौ ग्राम पानी में इसका (काढ़ा) बनाइए। जब पानी का आठवां भाग बाकी रह जाए तो उतार कर पांच ग्राम की मात्रा में रोगी को दिन में तीन बार तक पिलाइए।
कुक्कुर खांसी पर प्रयोग : बिल्व की हरी पत्तियों को गर्म तवे पर रख दीजिए। जब वे भुनकर काले रंग के हो जाएं तो उन्हें पीसकर कपड़छन कर लीजिए। फिर इसे शीशी में भरकर रख लीजिए। प्रात: दोपहर तथा सायं एक से 2 ग्राम तक शहद के साथ चाटने से हठीली से हठीली कुक्कुर खांसी एक सप्ताह के अन्दर (कभी-कभी एक ही दिन में) समाप्त हो जाती है।
रतौंधी पर प्रयोग : यह आंखों की बीमारी है। शाम होते ही दिखाई देना बन्द हो जाता है। बेल के ताजे पत्ते दस ग्राम, काली मिर्च सात दाने, पानी सौ ग्राम तथा चीनी (खांड) 25 ग्राम ले लें। बेल के पत्तों को खूब पीस लें। फिर उसमें काली मिर्च डालकर पीस लें। उसमें चीनी डालकर शरबत की तरह प्रात: सायं पिएं। बेल के पत्तों को रात में पानी में भींगने के लिए छोड़ दें। इसी पानी से प्रात: काल आंखों को धोएं। इस प्रकार करने से आंखों की रतौंधी 

रविवार, 22 मई 2011

गर्मी में रहना है कूल तो अपनाएं यह चमत्कारी फंडा


आज पूरी दुनिया में योग की धूम मची हुई है। वह समय चला गया जब योग को हिन्दू धर्म की उपासना पद्धति मानकर अन्य धर्मों के लोग इससे मुंह फेर लेते थे। लेकिन अब तस्वीर बदल चुकी है। विज्ञान ने भी अब योग को एकर वैज्ञानिक चिकित्सा पद्धति मानकर इसकी प्रामाणिकता पर मुहर लगा दी है।






गर्मियों की लगभग शुरुआत हो चुकी है। बारिश और ठंड की बजाय गर्मियों का सीजन सभी के लिये ज्यादा कठिन और पीड़ादायक होता  है। योग में एक ऐसी क्रिया है, जिसे करने मात्र 5 से 7 मिनिट लगते हैं तथा इसके करने से गर्मी में भारी राहत मिलती है। यह क्रिया है-शीतली प्राणायाम। आइये देखें इस योगिक क्रिया को कैसे किया जाता है-






शीतली प्राणायाम: पद्मासन में बैठकर दोनों हाथों से ज्ञान मुद्रा लगाएं। होठों को गोलाकार करते हुए जीभ को पाइप की आकृति में गोल बनाएं।






अब धीरे-धीरे गहरा लंबा सांस जीभ से खींचें। इसके बाद जीभ अंदर करके मुंह बंद करें और सांस को कुछ देर यथाशक्ति रोकें। फिर दोनों नासिकाओं से धीरे-धीरे सांस छोड़ें। इस क्रिया को 20 से 25 बार करें।






प्रतिदिन शीतली प्राणायाम करने से अधिक गर्मीं के कारण पैदा होने वाली बीमारियां और समस्याएं नहीं होती। लू लगना, एसिडिटी, आंखों और त्वचा के रोगों में तत्काल आराम मिलता है।

शनिवार, 21 मई 2011

गैस की शिकायत का समाधान



गैस की शिकायत दूर करने के लिए कब्ज और अपच दूर करना जरूरी है, क्योंकि इसी से गैस बनती है और गैस से सारी बीमारियाँ होती हैं। 


चिकित्सा : सौंठ, पीपल, काली मिर्च, अजमोद या अजवाइन, सेंधा नमक, सफेद जीरा, काला जीरा और भुनी हुई हींग इन सबको समान मात्रा में कूट-पीसकर महीन चूर्ण कर लें।इस चूर्ण को आधा चम्मच मात्रा में लेकर समभाग घी मिलाकर भोजन के साथ खाने से मंदाग्नि, अपच दूर होता है, वात प्रकोप शांत होता है, इसे 8 दिन लगातार लेने से इस समस्या से निजात मिलती है। 

दूसरा नुस्खा : अजवायन और काला नमक पीस कर समान मात्रा में मिला लें। इस चूर्ण को एक चम्मच मात्रा में गर्म पानी से लेने से अधोवायु निकल जाती है और गैस का प्रकोप शांत हो जाता है, पेट पर सेक करने से भी लाभ होता है

शुक्रवार, 20 मई 2011

बेल से घरेलू उपचार



बिल्वफल अर्थात् बेल का मूल वतन भारत ही है। अति प्राचीन काल से इसकी गणना औषधि के रूप में होती आ रही है। आकार की दृष्टि से यह गोल कैथ (कपित्थ) से मिलता-जुलता है। यह साधारण गेंद के समान होता है। हिमालय की तराई, मध्य एवं दक्षिण भारत, बिहार, बंगाल आदि प्रान्तों में बेल के वृक्ष बहुतायत मात्रा में पाये जाते हैं।
बिल्व का गूदा, पत्ता, जड़, छाल आदि औषधि के लिए उपयोगी माना जाता है। छोटे कच्चे बेल के फल को छीलकर, गोल-गोल कतरेनुमा टुकड़े काटकर सुखाकर मुखरबंद डिब्बों में संग्रह करके रखा जाता है। इसका उपयोग वैद्य लोग सालों भर तक औषधि के रूप में किया करते हैं। प्रयोग हेतु जंगली फलों का ही संग्रह करके रखा जाना उत्तम माना जाता है।
सेवन की दृष्टि से बेल का चूर्ण तीन ग्राम से छह ग्राम तक ही लेना उचित होता है। रस एक तोला से एक ग्राम तक ही सेवनीय होता है।
औषधीय प्रयोग : बिल्वपत्र के औषधीय गुणों का कारण उसमें स्थित ‘टॉनिन’ होता है। पाचन की तकलीफों और पुरानी पेचिश के लिए बिल्वफल के रस के समान अन्य कोई उपाय नहीं होता। इसका रस पौष्टिक होता है तथा रक्त विकार को भी दूर करता है।
बेल आमातिसार (बादी दस्त) तथा खूनी दस्त (रक्तातिसार) की अचूक औषधि है। दस्त, संग्रहणी (पेचिश), गर्भवती का वमन, बच्चों के दांत निकलते समय का दस्त, कब्ज, समज्वर, रक्तहीनता (एनीमिया), बहुमूत्र, प्रदर (ल्यूकोरिया), हैजा, मस्तिष्क की गर्मी, नपुंसकता, कुकर खांसी, फोड़ा, कंठमाला, रतौंधी, बहरापन, वायु गोला आदि का सफल चिकित्सक हैं। मच्छर-मक्खी भगाने के लिए भी बेल एक सस्ती दवा है।
रक्तहीनता का प्रयोग ः कमजोरी की अवस्था में खून की मात्रा शरीर में कम होने पर बेलगिरी का चूर्ण 5 ग्राम चीनी मिले हुए दूध के साथ दिन में चार बार तक खाने से एनीमिया दूर होता है।
बहुमूत्र पर प्रयोग : पेशाब के जल्दी-जल्दी आने पर दस ग्राम बेलगिरी और पांच ग्राम सोंठ को कूटकर रख लें। चार सौ ग्राम पानी में इसका (काढ़ा) बनाइए। जब पानी का आठवां भाग बाकी रह जाए तो उतार कर पांच ग्राम की मात्रा में रोगी को दिन में तीन बार तक पिलाइए।
कुक्कुर खांसी पर प्रयोग : बिल्व की हरी पत्तियों को गर्म तवे पर रख दीजिए। जब वे भुनकर काले रंग के हो जाएं तो उन्हें पीसकर कपड़छन कर लीजिए। फिर इसे शीशी में भरकर रख लीजिए। प्रात: दोपहर तथा सायं एक से 2 ग्राम तक शहद के साथ चाटने से हठीली से हठीली कुक्कुर खांसी एक सप्ताह के अन्दर (कभी-कभी एक ही दिन में) समाप्त हो जाती है।
रतौंधी पर प्रयोग : यह आंखों की बीमारी है। शाम होते ही दिखाई देना बन्द हो जाता है। बेल के ताजे पत्ते दस ग्राम, काली मिर्च सात दाने, पानी सौ ग्राम तथा चीनी (खांड) 25 ग्राम ले लें। बेल के पत्तों को खूब पीस लें। फिर उसमें काली मिर्च डालकर पीस लें। उसमें चीनी डालकर शरबत की तरह प्रात: सायं पिएं। बेल के पत्तों को रात में पानी में भींगने के लिए छोड़ दें। इसी पानी से प्रात: काल आंखों को धोएं। इस प्रकार करने से आंखों की रतौंधी जाती रहती है।

पेट की हर बीमारी के लिए रामबाण है यह नुस्खा

चिकित्सा के क्षेत्र में दुनिया ने काफी तरक्की कर ली है। लेकिन आज भी स्वास्थ्य कि क्षेत्र में प्राकृतिक चिकित्सा, आयुर्वेद और योग को सर्वाधिक भरोसेमंद और अचूक माना जाता है।  ऐलोपैथिक दवाइयां रोग के लक्षणों को दबाती और नष्ट करती है, जबकि प्राकृतिक चिकित्सा, आयुर्वेद और योग का लक्ष्य बीमारी को दबाना नहीं बल्कि शरीर को अंदर से मजबूत करके हर बीमारी को जड़ से मिटाना होता होता है। आयुर्वेद के अंतर्गग नीबू के प्रयोग को बेहद फायदेमंद और गुणकारी माना गया है।



नीबू में ऐसे कई दिव्य गुण होते हैं जो पेट संबंधी अधिकांस बीमारियों को दूर करने में बेहद कारगर होता है। खुल कर भूख न लगना, कब्ज रहना, खाया हुआ पचाने में समस्या आना, खट्टी डकारें आना, जी मचलाना, एसिडिटी होना, पेट में जलन होना....ऐसी ही कई बीमारियों में नीबू का प्रयोग बहुत फयदेमंद और कारगर सिद्ध हुआ है।



सावधानियां



 - निबू की तासीर ठंडी मानी गई है, इसलिये शीत प्रकृति के लोगों को इसका प्रयोग कम मात्रा में ही करना चाहिये।



 -जहां तक संभव हो नीबू का प्रयोग दिन में ही करना चाहिये, शाम को या रात में प्रयोग करने से सर्दी-जुकाम होने की  संभावना रहती है।



- व्यक्ति अगर किसी अन्य बीमारी से ग्रसित हो तो उसे किसी जानकार आर्वेदिक चिकित्सक से परामर्श के बाद ही नीबू  का सेवन करना चाहिये।

गुरुवार, 19 मई 2011

आधे सिर का दर्द अब चुटकियों में होगा छूमंतर


अक्सर लोग सिर दर्द की समस्या से परेशान रहते हैं, लेकिन कुछ लोगों ऐसे हैं जिनके लिए अक्सर होने वाला आधाशीशी का दर्द बडी परेशानी बन गया है। नीचे बताए जा रहे कुछ आयुर्वेद के उपायों से आप इस समस्या से हमेशा के लिए छुटकारा पा सकते हैं।

1. गाय का ताजा घी सुबह शाम दो चार बूंद नाक में डालने से टपकाने से आधाशीशी का दर्द हमेशा के लिए जड़ से खत्म हो जाता है।

2. सिर के जिस भाग में दर्द हो रहा हो उस तरफ  के नथुने में चार पांच बूंद सरसों के तेल की डालने से या तेल को सूंघने से आधासिर दर्द बन्द हो जाता है।

विशेष: इस विधि को अपनाने से नाक से खून आने(नकसीर) की समस्या भी दूर हो जाती है।

सावधानी: यह प्रयोग आयुर्वेद के किसी अनुभवी जानकार की देखरेख में करना ज्यादा सुरक्षित रहता है।

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