- भुनी हुई फिटकरी और अकरकरा को सिरके में मिला लें या बारीक पीसकर रख लें। इस मंजन से दांत साफ करने से पायरिया रोग में आराम मिलता है।
- आंवला जला कर भस्म कर लें। उसमें थोड़ा सा नमक मिलाकर सरसों के तेल के साथ मंजन करने से पायरिया रोग दूर हो जाता है।
बुधवार, 25 मई 2011
पायरिया
सोमवार, 23 मई 2011
मुंह में छाले हों तो
मुंह में छाले हों तो
मुंह में छाले हों तो त्रिफला के कुल्ले करें l
हड्डी टूटने पर
जिसकी हड्डियाँ कमज़ोर हों या हड्डी टूट गयी हो , वो लहसुन की कलियाँ, घी में सेंक कर लें , तो हड्डी जल्दी जुड़ेगी l अथवा गेंहू सेंक लें और पीस के वो आटा, शहद के साथ मिलाकर लें तो हड्डी जल्दी जुड़ेगी l
मोटापा हो तो ..
मोटापा हो तो गर्म पानी में १ पके बड़े नींबू का रस और शहद मिलाकर भोजन के तुरंत बाद पियें l
छाछ में तुलसी के पत्ते लेने से भी मोटापे में आराम होता है l
छाछ में तुलसी के पत्ते लेने से भी मोटापे में आराम होता है l
वजन बढ़ाना हो तो ..
वजन बढ़ाना हो तो रात को भैंस के दूध में चने भिगोकर सुबह चबा चबा कर खाएं l खजूर व किशमिश खाएं . इससे वज़न बढेगा l
शरीर टूटने पर, और जोड़ो के दर्द में
शरीर टूटता हो, जोड़ों का दर्द हो तो भोजन के आखिरी ग्रास में १/४ चम्मच अजवाइन मिलाकर, हनुमान जी का सुमिरन करके "नासे रोग हरे सब पीरा, जपत निरंतर हनुमंत बीरा" करके वो ग्रास चबाएं l शरीर टूटने व जोड़ों के दर्द में आराम होगा l
लकवे में ये करें
लकवा मार गया हो तो शहद के साथ लहसुन पीस के चाटें l लकवे में आराम होगा l
चैन की नींद के लिए
चैन की नींद न आती हो, तो सिरहाने की तरफ कपूर जलाकर "ॐ" का गुंजन करें l सुबह -शाम जलाने से वायु दोष दूर होगा, लक्ष्मी प्राप्ति होगी, बुरे सपने नहीं आयेंगे l
बेल से घरेलू उपचार
बिल्वफल अर्थात् बेल का मूल वतन भारत ही है। अति प्राचीन काल से इसकी गणना औषधि के रूप में होती आ रही है। आकार की दृष्टि से यह गोल कैथ (कपित्थ) से मिलता-जुलता है। यह साधारण गेंद के समान होता है। हिमालय की तराई, मध्य एवं दक्षिण भारत, बिहार, बंगाल आदि प्रान्तों में बेल के वृक्ष बहुतायत मात्रा में पाये जाते हैं।
बिल्व का गूदा, पत्ता, जड़, छाल आदि औषधि के लिए उपयोगी माना जाता है। छोटे कच्चे बेल के फल को छीलकर, गोल-गोल कतरेनुमा टुकड़े काटकर सुखाकर मुखरबंद डिब्बों में संग्रह करके रखा जाता है। इसका उपयोग वैद्य लोग सालों भर तक औषधि के रूप में किया करते हैं। प्रयोग हेतु जंगली फलों का ही संग्रह करके रखा जाना उत्तम माना जाता है।
सेवन की दृष्टि से बेल का चूर्ण तीन ग्राम से छह ग्राम तक ही लेना उचित होता है। रस एक तोला से एक ग्राम तक ही सेवनीय होता है।
औषधीय प्रयोग : बिल्वपत्र के औषधीय गुणों का कारण उसमें स्थित ‘टॉनिन’ होता है। पाचन की तकलीफों और पुरानी पेचिश के लिए बिल्वफल के रस के समान अन्य कोई उपाय नहीं होता। इसका रस पौष्टिक होता है तथा रक्त विकार को भी दूर करता है।
बेल आमातिसार (बादी दस्त) तथा खूनी दस्त (रक्तातिसार) की अचूक औषधि है। दस्त, संग्रहणी (पेचिश), गर्भवती का वमन, बच्चों के दांत निकलते समय का दस्त, कब्ज, समज्वर, रक्तहीनता (एनीमिया), बहुमूत्र, प्रदर (ल्यूकोरिया), हैजा, मस्तिष्क की गर्मी, नपुंसकता, कुकर खांसी, फोड़ा, कंठमाला, रतौंधी, बहरापन, वायु गोला आदि का सफल चिकित्सक हैं। मच्छर-मक्खी भगाने के लिए भी बेल एक सस्ती दवा है।
रक्तहीनता का प्रयोग ः कमजोरी की अवस्था में खून की मात्रा शरीर में कम होने पर बेलगिरी का चूर्ण 5 ग्राम चीनी मिले हुए दूध के साथ दिन में चार बार तक खाने से एनीमिया दूर होता है।
बहुमूत्र पर प्रयोग : पेशाब के जल्दी-जल्दी आने पर दस ग्राम बेलगिरी और पांच ग्राम सोंठ को
बहुमूत्र पर प्रयोग : पेशाब के जल्दी-जल्दी आने पर दस ग्राम बेलगिरी और पांच ग्राम सोंठ को
कूटकर रख लें। चार सौ ग्राम पानी में इसका (काढ़ा) बनाइए। जब पानी का आठवां भाग बाकी रह जाए तो उतार कर पांच ग्राम की मात्रा में रोगी को दिन में तीन बार तक पिलाइए।
कुक्कुर खांसी पर प्रयोग : बिल्व की हरी पत्तियों को गर्म तवे पर रख दीजिए। जब वे भुनकर काले रंग के हो जाएं तो उन्हें पीसकर कपड़छन कर लीजिए। फिर इसे शीशी में भरकर रख लीजिए। प्रात: दोपहर तथा सायं एक से 2 ग्राम तक शहद के साथ चाटने से हठीली से हठीली कुक्कुर खांसी एक सप्ताह के अन्दर (कभी-कभी एक ही दिन में) समाप्त हो जाती है।
रतौंधी पर प्रयोग : यह आंखों की बीमारी है। शाम होते ही दिखाई देना बन्द हो जाता है। बेल के ताजे पत्ते दस ग्राम, काली मिर्च सात दाने, पानी सौ ग्राम तथा चीनी (खांड) 25 ग्राम ले लें। बेल के पत्तों को खूब पीस लें। फिर उसमें काली मिर्च डालकर पीस लें। उसमें चीनी डालकर शरबत की तरह प्रात: सायं पिएं। बेल के पत्तों को रात में पानी में भींगने के लिए छोड़ दें। इसी पानी से प्रात: काल आंखों को धोएं। इस प्रकार करने से आंखों की रतौंधी
रविवार, 22 मई 2011
गर्मी में रहना है कूल तो अपनाएं यह चमत्कारी फंडा
आज पूरी दुनिया में योग की धूम मची हुई है। वह समय चला गया जब योग को हिन्दू धर्म की उपासना पद्धति मानकर अन्य धर्मों के लोग इससे मुंह फेर लेते थे। लेकिन अब तस्वीर बदल चुकी है। विज्ञान ने भी अब योग को एकर वैज्ञानिक चिकित्सा पद्धति मानकर इसकी प्रामाणिकता पर मुहर लगा दी है।
गर्मियों की लगभग शुरुआत हो चुकी है। बारिश और ठंड की बजाय गर्मियों का सीजन सभी के लिये ज्यादा कठिन और पीड़ादायक होता है। योग में एक ऐसी क्रिया है, जिसे करने मात्र 5 से 7 मिनिट लगते हैं तथा इसके करने से गर्मी में भारी राहत मिलती है। यह क्रिया है-शीतली प्राणायाम। आइये देखें इस योगिक क्रिया को कैसे किया जाता है-
शीतली प्राणायाम: पद्मासन में बैठकर दोनों हाथों से ज्ञान मुद्रा लगाएं। होठों को गोलाकार करते हुए जीभ को पाइप की आकृति में गोल बनाएं।
अब धीरे-धीरे गहरा लंबा सांस जीभ से खींचें। इसके बाद जीभ अंदर करके मुंह बंद करें और सांस को कुछ देर यथाशक्ति रोकें। फिर दोनों नासिकाओं से धीरे-धीरे सांस छोड़ें। इस क्रिया को 20 से 25 बार करें।
प्रतिदिन शीतली प्राणायाम करने से अधिक गर्मीं के कारण पैदा होने वाली बीमारियां और समस्याएं नहीं होती। लू लगना, एसिडिटी, आंखों और त्वचा के रोगों में तत्काल आराम मिलता है।
शनिवार, 21 मई 2011
गैस की शिकायत का समाधान
गैस की शिकायत दूर करने के लिए कब्ज और अपच दूर करना जरूरी है, क्योंकि इसी से गैस बनती है और गैस से सारी बीमारियाँ होती हैं।
चिकित्सा : सौंठ, पीपल, काली मिर्च, अजमोद या अजवाइन, सेंधा नमक, सफेद जीरा, काला जीरा और भुनी हुई हींग इन सबको समान मात्रा में कूट-पीसकर महीन चूर्ण कर लें।इस चूर्ण को आधा चम्मच मात्रा में लेकर समभाग घी मिलाकर भोजन के साथ खाने से मंदाग्नि, अपच दूर होता है, वात प्रकोप शांत होता है, इसे 8 दिन लगातार लेने से इस समस्या से निजात मिलती है।
दूसरा नुस्खा : अजवायन और काला नमक पीस कर समान मात्रा में मिला लें। इस चूर्ण को एक चम्मच मात्रा में गर्म पानी से लेने से अधोवायु निकल जाती है और गैस का प्रकोप शांत हो जाता है, पेट पर सेक करने से भी लाभ होता है
शुक्रवार, 20 मई 2011
बेल से घरेलू उपचार
बिल्वफल अर्थात् बेल का मूल वतन भारत ही है। अति प्राचीन काल से इसकी गणना औषधि के रूप में होती आ रही है। आकार की दृष्टि से यह गोल कैथ (कपित्थ) से मिलता-जुलता है। यह साधारण गेंद के समान होता है। हिमालय की तराई, मध्य एवं दक्षिण भारत, बिहार, बंगाल आदि प्रान्तों में बेल के वृक्ष बहुतायत मात्रा में पाये जाते हैं।
बिल्व का गूदा, पत्ता, जड़, छाल आदि औषधि के लिए उपयोगी माना जाता है। छोटे कच्चे बेल के फल को छीलकर, गोल-गोल कतरेनुमा टुकड़े काटकर सुखाकर मुखरबंद डिब्बों में संग्रह करके रखा जाता है। इसका उपयोग वैद्य लोग सालों भर तक औषधि के रूप में किया करते हैं। प्रयोग हेतु जंगली फलों का ही संग्रह करके रखा जाना उत्तम माना जाता है।
सेवन की दृष्टि से बेल का चूर्ण तीन ग्राम से छह ग्राम तक ही लेना उचित होता है। रस एक तोला से एक ग्राम तक ही सेवनीय होता है।
औषधीय प्रयोग : बिल्वपत्र के औषधीय गुणों का कारण उसमें स्थित ‘टॉनिन’ होता है। पाचन की तकलीफों और पुरानी पेचिश के लिए बिल्वफल के रस के समान अन्य कोई उपाय नहीं होता। इसका रस पौष्टिक होता है तथा रक्त विकार को भी दूर करता है।
बेल आमातिसार (बादी दस्त) तथा खूनी दस्त (रक्तातिसार) की अचूक औषधि है। दस्त, संग्रहणी (पेचिश), गर्भवती का वमन, बच्चों के दांत निकलते समय का दस्त, कब्ज, समज्वर, रक्तहीनता (एनीमिया), बहुमूत्र, प्रदर (ल्यूकोरिया), हैजा, मस्तिष्क की गर्मी, नपुंसकता, कुकर खांसी, फोड़ा, कंठमाला, रतौंधी, बहरापन, वायु गोला आदि का सफल चिकित्सक हैं। मच्छर-मक्खी भगाने के लिए भी बेल एक सस्ती दवा है।
रक्तहीनता का प्रयोग ः कमजोरी की अवस्था में खून की मात्रा शरीर में कम होने पर बेलगिरी का चूर्ण 5 ग्राम चीनी मिले हुए दूध के साथ दिन में चार बार तक खाने से एनीमिया दूर होता है।
बहुमूत्र पर प्रयोग : पेशाब के जल्दी-जल्दी आने पर दस ग्राम बेलगिरी और पांच ग्राम सोंठ को कूटकर रख लें। चार सौ ग्राम पानी में इसका (काढ़ा) बनाइए। जब पानी का आठवां भाग बाकी रह जाए तो उतार कर पांच ग्राम की मात्रा में रोगी को दिन में तीन बार तक पिलाइए।
कुक्कुर खांसी पर प्रयोग : बिल्व की हरी पत्तियों को गर्म तवे पर रख दीजिए। जब वे भुनकर काले रंग के हो जाएं तो उन्हें पीसकर कपड़छन कर लीजिए। फिर इसे शीशी में भरकर रख लीजिए। प्रात: दोपहर तथा सायं एक से 2 ग्राम तक शहद के साथ चाटने से हठीली से हठीली कुक्कुर खांसी एक सप्ताह के अन्दर (कभी-कभी एक ही दिन में) समाप्त हो जाती है।
रतौंधी पर प्रयोग : यह आंखों की बीमारी है। शाम होते ही दिखाई देना बन्द हो जाता है। बेल के ताजे पत्ते दस ग्राम, काली मिर्च सात दाने, पानी सौ ग्राम तथा चीनी (खांड) 25 ग्राम ले लें। बेल के पत्तों को खूब पीस लें। फिर उसमें काली मिर्च डालकर पीस लें। उसमें चीनी डालकर शरबत की तरह प्रात: सायं पिएं। बेल के पत्तों को रात में पानी में भींगने के लिए छोड़ दें। इसी पानी से प्रात: काल आंखों को धोएं। इस प्रकार करने से आंखों की रतौंधी जाती रहती है।
बिल्व का गूदा, पत्ता, जड़, छाल आदि औषधि के लिए उपयोगी माना जाता है। छोटे कच्चे बेल के फल को छीलकर, गोल-गोल कतरेनुमा टुकड़े काटकर सुखाकर मुखरबंद डिब्बों में संग्रह करके रखा जाता है। इसका उपयोग वैद्य लोग सालों भर तक औषधि के रूप में किया करते हैं। प्रयोग हेतु जंगली फलों का ही संग्रह करके रखा जाना उत्तम माना जाता है।
सेवन की दृष्टि से बेल का चूर्ण तीन ग्राम से छह ग्राम तक ही लेना उचित होता है। रस एक तोला से एक ग्राम तक ही सेवनीय होता है।
औषधीय प्रयोग : बिल्वपत्र के औषधीय गुणों का कारण उसमें स्थित ‘टॉनिन’ होता है। पाचन की तकलीफों और पुरानी पेचिश के लिए बिल्वफल के रस के समान अन्य कोई उपाय नहीं होता। इसका रस पौष्टिक होता है तथा रक्त विकार को भी दूर करता है।
बेल आमातिसार (बादी दस्त) तथा खूनी दस्त (रक्तातिसार) की अचूक औषधि है। दस्त, संग्रहणी (पेचिश), गर्भवती का वमन, बच्चों के दांत निकलते समय का दस्त, कब्ज, समज्वर, रक्तहीनता (एनीमिया), बहुमूत्र, प्रदर (ल्यूकोरिया), हैजा, मस्तिष्क की गर्मी, नपुंसकता, कुकर खांसी, फोड़ा, कंठमाला, रतौंधी, बहरापन, वायु गोला आदि का सफल चिकित्सक हैं। मच्छर-मक्खी भगाने के लिए भी बेल एक सस्ती दवा है।
रक्तहीनता का प्रयोग ः कमजोरी की अवस्था में खून की मात्रा शरीर में कम होने पर बेलगिरी का चूर्ण 5 ग्राम चीनी मिले हुए दूध के साथ दिन में चार बार तक खाने से एनीमिया दूर होता है।
बहुमूत्र पर प्रयोग : पेशाब के जल्दी-जल्दी आने पर दस ग्राम बेलगिरी और पांच ग्राम सोंठ को कूटकर रख लें। चार सौ ग्राम पानी में इसका (काढ़ा) बनाइए। जब पानी का आठवां भाग बाकी रह जाए तो उतार कर पांच ग्राम की मात्रा में रोगी को दिन में तीन बार तक पिलाइए।
कुक्कुर खांसी पर प्रयोग : बिल्व की हरी पत्तियों को गर्म तवे पर रख दीजिए। जब वे भुनकर काले रंग के हो जाएं तो उन्हें पीसकर कपड़छन कर लीजिए। फिर इसे शीशी में भरकर रख लीजिए। प्रात: दोपहर तथा सायं एक से 2 ग्राम तक शहद के साथ चाटने से हठीली से हठीली कुक्कुर खांसी एक सप्ताह के अन्दर (कभी-कभी एक ही दिन में) समाप्त हो जाती है।
रतौंधी पर प्रयोग : यह आंखों की बीमारी है। शाम होते ही दिखाई देना बन्द हो जाता है। बेल के ताजे पत्ते दस ग्राम, काली मिर्च सात दाने, पानी सौ ग्राम तथा चीनी (खांड) 25 ग्राम ले लें। बेल के पत्तों को खूब पीस लें। फिर उसमें काली मिर्च डालकर पीस लें। उसमें चीनी डालकर शरबत की तरह प्रात: सायं पिएं। बेल के पत्तों को रात में पानी में भींगने के लिए छोड़ दें। इसी पानी से प्रात: काल आंखों को धोएं। इस प्रकार करने से आंखों की रतौंधी जाती रहती है।
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