बुधवार, 11 जनवरी 2012

ठंड में पुरुष कर लें ये प्रयोग, ताकत के लिए और कुछ भी खाने की जरुरत नहीं रहेगी

आयुर्वेद में ठंड को खाने-पीने और सेहत बनाने के लिए सबसे बढिय़ा मौसम माना गया है। कहा जाता है कि सर्दियों के मौसम में सेवन की गई चीजों का प्रभाव शरीर पर सालभर रहता है। इसीलिए ठंड में सेहत बनाने के लिए लोग कई तरह की चीजों का सेवन करते हैं।

पुरुषों को तो आयुर्वेद में विशेषकर नपुंसकता दूर कर ठंड में ताकत देने वाली चीजों को प्रयोग करने को कहा गया है। आज हम बताने जा रहे हैं आपको एक ऐसा आयुर्वेदिक योग, जिसका प्रयोग करने के बाद पुरुषों को सालभर किसी भी तरह की ताकत बढ़ाने वाली दवाई या किसी अन्य चीज के इस्तेमाल की जरुरत नहीं होगी।

सामग्री - असगंध, सफेद मूसली, काली मूसली, कौंच के बीज, शतावर, ताल मखाना, बीजबंद, जायफल, जावित्री, ईसबगोल, नागकेशर, सोंठ, गोल मिर्च, लौंग, पीपर कमलगट्टे की गिरी, छुहारे, मुनक्का, चिरोंजी सब 50-50 ग्राम, मिश्री सवा दो किलो, घी 400 ग्राम। 

बनाने की विधि- मिश्री और घी को छोड़कर  शेष सारी औषधियों को अलग-अलग कूटपीस कर कपड़े से छान लें। सबको मिलाकर घी में भून लें।अब मिश्री की पतली चाशनी बनाकर उतार लें और सारी दवा इसमें डालकर अच्छी तरह मिलाकर उपर सोने व चांदी का वर्क मिला दें।

सेवन विधि - 10 से 20 ग्राम इस योग को चाटकर उपर से एक गिलास गरमागरम दूध पी जाएं। 

 लाभ -सर्दियों में कुछ दिन इसका लगातार सेवन करते रहने से नपुंसकता दूर होती है। वीर्य गाढ़ा और पुष्ट होता है। शरीर बलवान बन जाता है।इसके अलावा पेशाब में जलन, पथरी और वात रोग भी इसके लगातार सेवन से मिट जाते हैं।

बिना पैसे की ये दवा खूबसूरती को कर देगी सौ-गुना

हर व्यक्ति चाहता है कि उसका व्यक्तित्व आकर्षक हो, कोई भी उससे मिले तो प्रभावित हो। इसके जरूरी है कि आप हर पल ऊर्जावान और जोश से भरपूर दिखाई दें आपके चेहरे पर हमेशा चमक बनी रहे।मुरझाया हुआ चेहरा किसी को आकर्षित नहीं सकता। परंतु आजकल की दौड़भाग भरे जीवन में खुद को हमेशा ऊर्जावान बनाए रखना सबसे बड़ी चुनौती है। तो आकर्षक व्यक्तित्व के लिए प्रतिदिन कुछ समय ध्यान अवश्य करें साथ ही नटराज आसन व हंसासन करें। 



नटराज आसन-

समतल स्थान पर कंबल आदि बिछाकर दोनों पैर मिलाकर खड़े हो जाएं। इसके बाद बाएं पैर पर संतुलन बनाते हुए दाएं पैर को पीछे की ओर जितना अधिक से अधिक संभव हो ऊपर उठाएं। अब दाएं हाथ को पीछे करके ऊपर उठे दाएं पैर के टखनों को पकड़ लें। सिर को सीधा करके दाएं हाथों को ऊपर की ओर नाक के सीध में रखें। सांस सामान्य रखें। आसन की इस स्थिति में शरीर का संतुलन जितने देर तक बनाकर रखना सम्भव हो बनाकर रखें और सामान्य स्थिति में आ जाएं। इसके बाद सीधे होकर यह क्रिया दूसरे पैर से भी करें। इस क्रिया को दोनो पैरों से बदल-बदल कर करें।



 हंसासन- समतल स्थान पर कंबल आदि बिछाकर घुटनों के बल बैठ जाएं। अब दोनों हाथों को फर्श पर टिकाकर रखें। अंगुलियों को आगे की ओर करके व अंगुलियों को खोलकर रखें। दोनों हाथों के बीच 10 इंच की दूरी रखें। अब घुटनों को मोड़कर आगे की ओर और कोहनियों को मोड़कर पीछे की ओर करें। इसके बाद धीरे-धीरे सांस छोड़ते हुए दोनों हथेलियों पर जोर देकर अपने शरीर के पिछले भाग को ऊपर उठाएं तथा शरीर का पूरा भाग हथेलियों पर रखकर संतुलन बनाएं। अब गर्दन को आगे की ओर झुकाकर शरीर का आकार पक्षी की तरह बनाएं। इस स्थिति में 10 से 30 सैकेण्ड तक रहें और इस क्रिया को 2 से 3 बार करें। शुरु में यह अभ्यास कठिन होता है, परन्तु प्रतिदिन अभ्यास करने से यह सरल हो जाता है। आसन करते समय रखें सावधानी: इस आसन का अभ्यास शुरु में करना कठिन होता है। इस आसन की सभी क्रिया धीरे-धीरे करें तथा सांस लेने व छोडऩे की क्रिया सामान्य रुप से करें। आसन के लाभ: इस आसन से हाथ व पैरों की मांसपेशियां मजबूत होती है तथा गर्दन का मोटापा कम होता है। इस से छाती मजबूत, तथा शरीर शक्तिशाली बनता है। इस आसन से चेहरे पर तेज, चमक तथा शरीर में स्फूर्ति व ताजगी आती है। नाड़ी-तंत्र (स्नायु तंत्र) सही रुप से काम करने लगता है, जिससे रक्त संचार (खून का बहाव) तेज हो जाता है।



सीत्कारी प्राणायाम-

सीत्कारी प्राणायाम में सीत्कार का शब्द करते हुए सांस लेने की क्रिया होती है। इस प्राणायम में नासिका से सांस नहीं ली जाती है बल्कि मुंह के होठों को गोलाकार बना लेते हैं और जीभ के दाएं और बाएं के दोनों किनारों को इस प्रकार मोड़ते हैं कि जीभ का का आकार गोलाकार हो जाए। इस गोलाकार जीभ को गोल किए गए होठों से मिलाकर इसके छोर को तालू से लगा लिया जाता है। अब सीत्कार के समान आवाज करते हुए मुख से सांस लें। फिर कुंभक करके नासिका के दोनों छिद्रों से सांस छोड़ी जाती है। पुन: इस क्रिया को दोहराएं। इसे बैठकर या खड़े होकर भी किया जा सकता है।इस प्राणायाम से चेहरे पर तेज, चमक आती है।

मंगलवार, 10 जनवरी 2012

चमत्कारी जड़ी बूटी: इसे खाने से दिखने लगते हैं भूत, भविष्य और वर्तमान

ब्राह्मी एक ऐसी जड़ी बूटी है जिसे आयुर्वेद में बहुत उपयोगी माना गया है। ब्राह्मी तराई वाले स्थानों पर उगती है। बुद्धि तथा उम्र को बढ़ाती है। यह रसायन के समान होती है। ब्राह्मी में एल्केलाइड तथा सेपोनिन नामक दो मुख्य: जैव सक्रिय पदार्थ पाए जाते हैं। इसमें पाए जाने वाले दो मुख्य एल्केलाइड हैं ब्राह्मीन तथा हरपेस्टिन जबकि बेकोसाइड ए तथा बी मुख्य सेपोनिन हैं। 

गुणों की दृष्टि से ब्राह्मी कुचला में पाए जाने वाले एल्केलाइड स्ट्रिकनीन के समान हैं परन्तु यह उसकी तरह विषाक्त नहीं होती।  ब्राह्मी में बोटूलिक अम्ल, स्टिग्मा स्टेनॉल, बीटा-साइटोस्टीरॉल तथा टेनिन आदि भी पाए जाते हैं। हरे पत्तों में प्राय: एल्केलाइड तथा उडऩशील तेल पाए जाते हैं जबकि सूखे पौधों में सेण्टोइक एसिड तथा सेण्टेलिंक एसिड भी पाए जाते हैं। बुखार को खत्म करती है। याददाश्त को बढ़ाती है।

 सफेद दाग, पीलिया, प्रमेह और खून की खराबी को दूर करती है। खांसी, पित्त और सूजन को रोकती है। बैठे हुए गले को साफ  करती है। ब्राह्मी का उपयोग दिल के लिए लाभदायक होता है। यह मानसिक पागलपन को दूर करता है। सही मात्रा के अनुसार इसका सेवन करने से निर्बुद्ध, त्रिकालदर्शी यानी भूत, भविष्य और वर्तमान सब दिखाई देने लगते हैं। मण्डूक परनी भी ब्राह्मी के गुणों के समान होती है। ब्राह्मी घृत, ब्राही रसायन, ब्राही पाक, ब्राह्मी तेल, सारस्वतारिष्ट, सारस्वत चूर्ण आदि के रूप में प्रयोग किया जाता हैं। 

वीक मेमोरी में ब्राह्मी का रस या चूर्ण पानी के साथ रोगी को दिया जाना चाहिए। ब्राह्मी के तेल की मालिश से कमजोर मस्तिष्क मजबूत हो जाता है तथा बुद्धि बढती है। तेल बनाने के लिए 1 लीटर नारियल तेल में लगभग 15 तोला ब्राह्मी का रस उबाल लें। यह तेल सिरदर्द, चक्कर, भारीपन, चिंता आदि से भी राहत दिलाता है। हिस्टीरिया जैसे रोगों में यह तुरन्त प्रभावी होती है जिससे सभी लक्षण तुरन्त नष्ट हो जाते हैं। चिन्ता तथा तनाव में ठंडाई के रूप में भी इसका प्रयोग किया जाता है। इसके अतिरिक्त किसी बीमार या अन्य बीमारी के कारण आई निर्बलता के निवारण के लिए इसका प्रयोग किया जाता है। कुष्ठ और चर्म रोगों में भी यह उपयोगी है। खांसी तथा गला बैठने पर इसके रस का सेवन काली मिर्च तथा शहद के साथ करना चाहिए। 

सोमवार, 9 जनवरी 2012

आसान उपाय: कमर दर्द से मिलेगा छुटकारा, नहीं रहेगी दवा की दरकार

महिलाओं को पुरुषों की तुलना में कमर दर्द अधिक परेशान करता र्है। वैसे तो कमर दर्द के कई कारण हो सकते हैं, लेकिन अधिकांशत: मांसपेशियों में खिंचाव और रीढ़ की हड्डी में दर्द के चलते कमर दर्द होता है। लेकिन इस दर्द के कारण कई अन्य दिक्कतें भी हो सकती हैं। लेकिन दवाओं से हमेशा के लिए कमर दर्द से  छुटकारा पाना संभव नहीं है। अगर आपके साथ भी कमर दर्द की समस्या है, तो नीचे लिखे योगासनों को नियमित रूप से करें जल्द ही कमर दर्द से छुटकारा मिल जाएगा।

पवन मुक्तासन 

कमर के बल लेटें। दाएं घुटने को हाथों से पकड़ कर जंघा को पेट पर दबाते, सांस छोड़ते हुए घुटने को सीने के पास ले आएं। ठोड़ी को घुटने से छूने का प्रयास करें। बायां पैर जमीन पर सीधा टिका रहे। श्वास भरते हुए पैर व सिर को वापस जमीन पर लाएं। ऐसे ही बाएं पैर से करें व फिर दोनों पैरों से। इसे पांच बार दोहराएं। यह क्रियाएं रीढ़ की हड्डी को लचीला व मजबूत बनाएंगी।

तानासन 

जमीन पर आसन बिछाएं व कमर के बल उस पर लेट जाएं। एड़ी-पंजे मिले रहें व हथेलियां जमीन पर जंघाओं की बगल में टिकी रहें। श्वास भरते हुए हाथों को सिर के ऊपर ले जाएं और हथेलियां आपस में जोड़ लें। पूरे शरीर में खिंचाव महसूस करें। कमर से ऊपर का भाग ऊपर की ओर खींचें व नीचे का नीचे की ओर। फिर धीरे-धीरे सांस छोड़ते हुए हाथों को वापस ले आएं। 

सर्पासन 

पेट के बल लेट जाएं। पैरों को पीछे की ओर खींचें व एड़ी-पंजे मिलाए रखें। सांप की पूंछ की तरह। हथेलियों व कोहनियों को पसलियों के पास लाएं। ऐसे कि हथेलियां कंधों के नीचे आ जाएं और सिर जमीन को छुए। आंखें बंद रखें। चेहरा व सीना ऊंचा उठाएं, कमर के वजन पर सांप की तरह। इस स्थिति में जब तक हो सके, बनी रहें। फिर धीरे-धीरे सांस छोड़ते हुए जमीन पर वापस आ जाएं। विश्राम करें, हथेलियां सिर के नीचे टिका दें।

गुरुवार, 5 जनवरी 2012

दस मिनट का सरल प्रयोग: इससे दिमाग चलने नहीं दौडऩे लगेगा


शरीर को सुंदर बनाए रखने के लिए हम सब क्या कुछ नहीं करते हैं। लेकिन बिना स्वस्थ मस्तिष्क के सुंदरता का कोई महत्व नहीं रह जाता है। इसलिए सुंदरता को सम्मान तभी मिलता है, जब उसके साथ तेज दिमाग भी होता है। जब हम सुंदरता के लिए इतने जतन करते हैं, तो दिमाग के साथ बेरुखी क्यों? हम सभी जानते हैं कि शरीर को फिट रखने के लिए योगा या एक्सरसाइज बहुत जरूरी है। ऐसे ही अगर आप अपने दिमाग को हमेशा फिट और तेजतर्रार बनाएं रखना चाहते हैं, तो रोज दस मिनट तक नीचे लिखा योगासन कर सकते हैं।

  भद्रासन विधि- आसन बिछाकर बैठ जाएं। दाहिना पैर घुटने से मोड़कर एड़ी उपस्थ और गुदा के मध्य के दाहिने भाग में और बायां पैर मोड़कर एड़ी सीवन के बायें भाग में इस प्रकार रखें कि दोनों पैर के तलवे एक दूसरे को लगकर रहें। इस स्थिति को रेचक कहते हैं। रेचक करके दोनों हाथ सामने जमीन पर रखें। धीरे-धीरे शरीर को ऊपर उठाएं और दोनों पैर के पंजों पर इस प्रकार बैठें कि शरीर का वजन एड़ी के मध्य भाग पर आए। ध्यान रहे अंगुलियों वाला भाग छूटा रहे।

लाभ- इस आसन से शरीर फूर्तिला और फिट रहता है। बुद्धि तीक्ष्ण होती है। कल्पनाशक्ति का भी विकास होता है। चंचलता कम होती है। पाचन शक्ति बढ़ती है। शरीर शुद्धि होने लगती है। स्नायु मजबूत होता है। धातुक्षय, गैस, मधुप्रमेह, स्वप्नदोष, अजीर्ण, कमर का दर्द, गर्दन की दुर्बलता, बन्धकोष, मन्दाग्नि, सिरदर्द, क्षय, हृदयरोग, अनिद्रा, दमा, मूर्छारोग, बवासीर, उल्टी, हिचकी, अतिसार,उदररोग, नेत्रविकार आदि असंख्य रोगों में इस आसन से लाभ होता है।

लंबी उम्र तक रहेंगे चमचमाते मजबूत दांत बस याद रखें ये बात

स्वस्थ मोतियों से चमकदार दांत किसी की भी खूबसूरती में चार चांद लगा देते हैं। वहीं दूसरी तरफ मैले व अस्वस्थ दांत सुंदरता को कम कर देते हैं। इसलिए सौंदर्य का खास ख्याल रखने के साथ ही पूरे व्यक्तित्व को प्रभावशाली बनाने के लिए दांतो के स्वास्थ्य का विशेष ख्याल रखना बहुत आवश्यक है। वैसे तो दांतों की समस्या होने पर डेंटल ट्रिटमेंट जरुरी है लेकिन फिर भी अगर कोई भी नीचे लिखी छोटी-छोटी बातों का ध्यान रखें, तो अपनी मुस्कान लंबी उम्र तक कायम रख सकता है।

 - नियमित रूप से दिन में कम से कम दो बार ब्रश करें।

-  खाने में फल और सब्जियां सेब, गाजर, ककड़ी, खीरा खाएं। इनसे मुंह साफ रहता है। 

- कोई भी कोल्डड्रिंक पीने के बाद ब्रश जरुर करें, पर आरेंज जूस पीने के 20 मिनट बाद ब्रश करें, क्योंकि इससे दांतों पर एनेमल का कवर चढ़ने में मदद मिलती है।

- कभी-कभी बेकिंग सोडा से ब्रश किया जा सकता है। लेकिन इसके पानी को पीना नहीं चाहिए।

- दांतों के साथ जीभ को भी साफ करना जरूरी है। इससे सांस की बदबू दूर होने में सहायता मिलती है और इसके साथ जीभ पर जमी गंदगी से पैदा होने वाले संक्रामक रोगों से भी बचा जा सकता है।

- शक्कर और मीठे पदार्थ बैक्टीरिया को पनपने में सहायक होता है, जिससे दांत कमजोर होते हैं। शुगर कम से कम लें।

- पानी ज्यादा से ज्यादा पीएं। 

- साल में कम से कम एक बार दांतों की क्लीनिंग भी अवश्य कराएं।

बुधवार, 4 जनवरी 2012

छोटे-छोटे घरेलू उपाय: कान के दर्द से मिलेगा छुटकारा वो भी बिना झंझट

कान के दर्द की बीमारी अधिकतर उन्ही लोगों को परेशान करती हैं, जिन्हें हमेशा सर्दी बनी रहती है। लगातार बनी रहने वाला कफ या सर्दी कई तरह के कान के रोग पैदा कर देती है।अगर सर्दी का इलाज जल्द नहीं किया गया तो सुनने की शक्ति पर असर पड़ सकता है। यह देखा गया है कि अधिकतर रोगियों के कान में पस का निर्माण हो जाता है, जो अपने आप में कान का एक गंभीर रोग होता है और इसका जल्द से जल्द इलाज कराना जरुरी होता है। अगर आपको भी सर्दी में कान के दर्द की समस्या सता रही है तो अपनाएं ये रामबाण उपाय।



- कान के रोग के उपचार के लिए बेल के पेड़ की जड़ को नीम के तेल में डुबोकर उसे जला दें और जो तेल इसमें से रिसेगा, वह सीधे कान में डाल दें। इससे कान के दर्द में राहत मिलती है।



- तुलसी का रस गुनगुना करके कान में डालने से भी कान के रोगों में सहायता मिलती है।



-  अदरक के रस में नींबू का रस मिलाएं और इसकी चार पांच बूंदें कान में डालें। आधे घंटे के बाद रुई से कान को साफ  कर दें।



नोट- कान की बीमारियों मे लापरवाही बिल्कुल न बरतें। आयुर्वेदिक उपचार से फायदा नहीं हो रहा हो तो किसी अच्छे डॉक्टर से इलाज करवानी चाहिए।

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