बुधवार, 17 सितंबर 2014

मल्टीपल स्कलेरोसीस रोग

मल्टीपल स्कलेरोसीस रोग होने के लक्षण-
          इस रोग से पीड़ित कई रोगियों में अलग-अलग लक्षण दिखाई देते हैं। इस रोग से पीड़ित रोगी को पहले तेज लक्षण सामने प्रकट होते हैं तथा कुछ सप्ताह महीनों या वर्षों के बाद ये लक्षण गायब हो जाते हैं। इस रोग के दुबारा से लक्षण कभी भी दिख सकते हैं और हो सकता है कि इस रोग का आक्रमण जीवनभर कभी भी न हो। इस रोग की शुरुआती अवस्था में रोगी व्यक्ति को थकावट होती है तथा उसका मानसिक संतुलन बिगड़ जाता है। इस रोग से पीड़ित रोगी के हाथ-पैर कमजोर हो जाते हैं तथा सुन्न हो जाते हैं। रोगी की आंखों में कई प्रकार की समस्या हो जाती है तथा रोगी को बोलने में परेशानी होने लगती है। रोगी व्यक्ति को पेशाब पर नियंत्रण नहीं रहता है और उसका पेशाब अपने आप निकल जाता है।
 कारण-इस रोग के होने का सबसे प्रमुख कारण असंतुलित खान-पान है। गलत तरीके के खान-पान के कारण रोगी के शरीर में दूषित द्रव्य जमा हो जाता है जिसके कारण यह रोग व्यक्ति को हो जाता है।
  • अत्यधिक मानसिक तनाव रहने के कारण भी यह रोग व्यक्ति को हो सकता है।
 उपचार-मल्टीपल स्कलेरोसीस रोग का उपचार करने के लिए रोगी व्यक्ति को कम से कम 5 दिनों तक फलों तथा सब्जियों का रस सेवन करने के लिए देना चाहिए तथा रोगी व्यक्ति को उपवास रखने के लिए कहना चाहिए तथा इसके बाद रोगी को गर्म पानी का एनिमा क्रिया कराके उसके पेट को साफ करना चाहिए। जिसके फलस्वरूप शरीर का खून साफ हो जाता है और दूषित द्रव्य शरीर के बाहर निकल जाते हैं और रोगी का यह रोग कुछ ही दिनों में ठीक हो जाता है।
  • मल्टीपल स्कलेरोसीस रोग से पीड़ित रोगी को मौसम के अनुसार सभी प्रकार के फलों तथा सब्जियों का सेवन करना चाहिए क्योंकि ये पदार्थ रोगी के लिए बहुत अधिक लाभदायक होते हैं। ये फल कुछ इस प्रकार हैं- चुकन्दर, गाजर, खीरा, पत्तागोभी, मूली, टमाटर आदि।
  • मल्टीपल स्कलेरोसीस रोग से पीड़ित रोगी को विटामिन `बी` तथा `ई` युक्त फलों का सेवन करना चाहिए तथा अंकुरित अन्न का सेवन अधिक करना चाहिए और रोगी को यदि थकावट हो रही हो तो उसे अपने थकावट को दूर करने के लिए अधिक से अधिक आराम करना चाहिए। इस प्रकार से प्राकृतिक चिकित्सा से उपचार करने से रोगी का रोग कुछ ही दिनों में ठीक हो जाता है।

दुबलापन होने का कारण

दुबलापन होने का कारण:-
  • पाचन शक्ति में गड़बड़ी के कारण व्यक्ति अधिक दुबला हो सकता है।
  • मानसिक, भावनात्मक तनाव, चिंता की वजह से व्यक्ति दुबला हो सकता है।
  • यदि शरीर में हार्मोन्स असंतुलित हो जाए तो व्यक्ति दुबला हो सकता है।
  • चयापचयी क्रिया में गड़बड़ी हो जाने के कारण व्यक्ति दुबला हो सकता है।
  • बहुत अधिक या बहुत ही कम व्यायाम करने से भी व्यक्ति दुबला हो सकता है।
  • आंतों में टेपवोर्म या अन्य प्रकार के कीड़े हो जाने के कारण भी व्यक्ति को दुबलेपन का रोग हो सकता है।
  • मधुमेह, क्षय, अनिद्रा, जिगर, पुराने दस्त या कब्ज आदि रोग हो जाने के कारण व्यक्ति को दुबलेपन का रोग हो जाता है।
  • शरीर में खून की कमी हो जाने के कारण भी दुबलेपन का रोग हो सकता है।
 उपचार:-
  • थायरायड ग्रंथि के लिए पोषक तत्व, आयोडीन युक्त पदार्थों में अधिक मात्रा में पाए जाते हैं। इन पदार्थों का अधिक मात्रा में सेवन करने से रोगी को बहुत अधिक लाभ मिलता है।
  • ताजी हरी सब्जियों में भी आयोडीन पदार्थ अधिक होता है। इसलिए ताजी हरी सब्जियों का भोजन में अधिक प्रयोग करना चाहिए।
  • अधिक पतले व्यक्ति को मिर्च-मसालेदार सब्जियां तथा भोजन नहीं करना चाहिए।
  • अधिक पतले व्यक्ति को अपने पतलेपन का उपचार करने के लिए 2-3 दिनों तक अधिक मात्रा में फल खाने चाहिए तथा इसके साथ में प्रतिदिन कम से कम 100 ग्राम चोकर खाना चाहिए। इसके फलस्वरूप पतले व्यक्ति को बहुत अधिक लाभ मिलता है।
  • अधिक पतले व्यक्ति को आटे के चोकर फलों में मिलाकर या फिर फल के रस में घोलकर सेवन करने से कुछ ही दिनों में अधिक लाभ मिलता है।
  • गूदेदार फल जैसे-पपीते में चोकर मिलाकर प्रतिदिन सेवन करने से व्यक्ति को पतलेपन से काफी हद तक छुटकारा मिल जाता है।
  • रोगी को अधिक मात्रा में अपने भोजन में फलों का उपयोग करना चाहिए। इससे व्यक्ति की पाचनशक्ति बढ़ती है और व्यक्ति को भूख अधिक लगती है। जिसके फलस्वरूप उसे पतलेपन से छुटकारा मिल जाता है।
  • व्यक्ति को अपना वजन बढ़ाने के लिए आटा, चावल, मीठा, किशमिश, खजूर, अंजीर तथा मुनक्का का भोजन में अधिक सेवन करना चाहिए।
  •  व्यक्ति को अपने पतलेपन को दूर करने के लिए चिकनाई की वनस्पति, श्वेतसार पदार्थ जिनसे वजन बढ़ने लगता है, अधिक मात्रा में सेवन करने चाहिए।
  • व्यक्ति को अपने पतलेपन को दूर करने के लिए प्रतिदिन अंकुरित दाल का भोजन में उपयोग करना चाहिए।
  • व्यक्ति को अपना वजन बढ़ाने के लिए सुबह के समय में उठते ही तथा रात को सोते समय और भोजन के 2 घण्टे के बाद या फिर उससे पहले थोड़ा-थोड़ा अधिक मात्रा में पानी पीना चाहिए।
  • व्यक्ति को सुबह के समय में व्यायाम करना चाहिए और टहलना चाहिए।
  • प्राकृतिक चिकित्सा के अनुसार गर्म दूध का उपयोग करने से वजन बढ़ने लगता है। इस प्रकार से रोगी का इलाज प्राकृतिक चिकित्सा से करने से कुछ ही दिनों में रोगी व्यक्ति पतलेपन से पूरी तरह से ठीक हो जाता है।
  • दुबलेपन रोग का प्राकृतिक चिकित्सा से उपचार करने के लिए सबसे पहले रोगी व्यक्ति को अपनी पाचनक्रिया में सुधार करना चाहिए। इसके बाद इस रोग का उपचार करना चाहिए।
  • दुबलेपन रोग का उपचार करने के लिए रोगी को कुछ दिनों तक उपवास रखना चाहिए। इसके बाद कुछ दिन तक फल, सलाद, अंकुरित पदार्थों का सेवन करना चाहिए।
  • दूध, केला, भिगोए हुए खजूर, पका हुआ आम, किशमिश आदि का उपयोग भोजन में अधिक करना चाहिए।
  • रोगी व्यक्ति को भूख से अधिक बिल्कुल भी नहीं खाना चाहिए तथा सदैव पौष्टिक भोजन करना चाहिए।
  • दुबले व्यक्ति को प्रतिदिन 100 ग्राम हरे पत्ते वाली सब्जियों जैसे पत्तागोभी, बथुआ, धनिया, पुदीना मूली के पत्ते तथा पालक का सेवन करना चाहिए।
  • दूब का रस तथा नारियल पानी प्रतिदिन पीना बहुत ही लाभदायक होता है।
  • 100 मिलीलीटर गाजर का रस, 50 मिलीलीटर पालक का रस और 50 मिलीलीटर चुकन्दर के रस को एक साथ मिलाकर प्रतिदिन पीने से रोगी के शरीर में शक्ति आ जाती है जिसके फलस्वरूप रोगी का पतलापन दूर होता जाता है।
  • प्राकृतिक चिकित्सा के अनुसार दुबलेपन को दूर करने के लिए कई प्रकार के आसन हैं जिनको करने से कुछ ही दिनों में दुबलापन दूर हो जाता है ये आसन इस प्रकार हैं- नित्य प्रति पर्याप्त व्यायाम, योगमुद्रासन, सर्वांगासन, हलासन, मत्स्यासन, प्राणायाम तथा कटिस्नान आदि।
  •  दुबलेपन को दूर करने के लिए एनिमा लेना भी काफी फायदेमंद होता है।

मंगलवार, 16 सितंबर 2014

चर्म रोगों के लिए मलहम

चर्म रोगों के लिए मलहम  
25 मी.ली नीम का तेल, 25 मी.ली करंज का तेल, 25 मी.ली सरसों का तेल, 25 मी.ली कुसुम का तेल, 25 ग्राम गंधक, 100 ग्राम चरोटा, 100 ग्राम अमलतास एवं 25 ग्राम जटामांसी को लेकर सबसे पहले चरोटा, जटामांसी और अमलतास का क्वाथ बना लें. इस क्वाथ में में सारे तेलों को मिलकर धीमी आँच पर पकाएं. जब सारा पानी सुखकर सर तेल बच जाए उसे तेल को आंच से उतारकर छानकर उसमे 25 ग्राम मोम मिलाकर आँच पर चढ़ा दे. जब मोम उस तेल में मिल जाये फिर उसमे गंधक मिलाकर आंच से उतार लें. अब आपका मलहम तैयार है. चर्मरोगों में हमेशा नीम युक्त साबुन से ही स्नान करें.


पारंपरिक सौंदर्यवर्धक नुस्खे
 जायफल को गाय के दूध में घिसकर उसका लेप चेहरे पर 1 घंटा लगाकर धोने से चेहरे की कांति बढ़ती है. धूप की कालिमा (सनबर्न) से बचने के लिए धूप में कम घूमे साथ ही चेहेरे पर संतरे के छिलकों को बारीक़ काटकर चेहरे पर लगाने से सनबर्न से बचे रह सकते है.

दूध का महत्व



प्रोटीन,विटामिन,कार्बोहाइड्रेट,खनिज,वसा,आयरन और इन्जाइम से भरपूर होता है।
बुद्धि के विकास के लिए लाभप्रद है।
केल्शियम और फास्फोरस दांतों के लिए लाभकारी हैं।
विटामिन से आँखों की रौशनी बड़ती है।
विटामिन बी नाडी मंडल के लिए लाभकारी है।
विटामिन सी शरीर में रोग प्रतिरोधक क्षमता पैदा करता रात रात रात रात।
रात में सोने से पहले १ कप दूध का सेवन करने से नये रक्त का निर्माण होता है।
हल्के गर्म दूध का सेवन पाचन तन्त्र को ठीक रखता है। {प्रात: काल }
मधुमय रोगियों को वसा रहित दूध पिने की सलाह दी जाती है।
दूध में काली मिर्च और मिश्री मिलाकर पीने से सर्दी-जुकाम में आराम मिलता है।

मुहँ के छालो का घरेलु इलाज

10 ग्राम नीला थोथा और 10 ग्राम फिटकरी को अलग-अलग लेकर तवे पर भून लें. ध्यान रखे नीले थोथे को भूनते समय उसका धुँआ आखों में नहीं जाना चाहिए और नीले थोथे को पूरी तरह नहीं भूनकर आधा ही भूने. अब भूनी हुई फिटकरी और नीले थोथे को मिलकर चूर्ण कर ले. इसके 1 ग्राम चूर्ण को 1 चम्मच पानी में मिलाकर कर रुई के फाहे की मदद से मुहँ के छालों पर लगाकर 1-2 मिनिट तक रखें. ऐसा करते समय इस बात की सावधानी रखे के इसको लगाने पर मुहँ में बनाने वाली लार को थूक दे इसे अन्दर नहीं जाने दे. ऐसा करने पर भी यदि छाले ठीक न हो तो यह चुटकी भर भस्म सीधे छालों पर लगाए. इस उपचार को खाली पेट करे. बाद में मुहँ को पानी से अच्छी तरह साफ कर ले. अमरुद और चमेली के पत्तों को चबाने से मुहँ के छालों में लाभ मिलता है

बांझपन चिकित्सा से उपचार

  • स्त्री को गर्भधारण कराने के लिए उसकी योनि के स्नायु स्वस्थ हो इसके लिए स्त्री का सही आहार, उचित श्रम एवं तनाव रहित होना जरूरी है तभी स्त्री गर्भवती हो सकती है इसलिए स्त्री को इस पर अधिक ध्यान देना चाहिए।
  • स्त्री को गर्भधारण करने के लिए यह भी आवश्यक है कि योनिस्राव क्षारीय होना चाहिए इसलिए स्त्री का भोजन क्षारप्रधान होना चाहिए। इसलिए उसे अधिक मात्रा में अपक्वाहार तथा भिगोई हुई मेवा खानी चाहिए।
  • इस रोग से पीड़ित स्त्रियों को अपने इस रोग का इलाज करने के लिए सबसे पहले अपने शरीर से विजातीय द्रव्यों को बाहर निकालना चाहिए इसके लिए स्त्री को उपवास रखना चाहिए। इसके बाद उसे 1-2 दिन के बाद कुछ अंतराल पर उपवास करते रहना चाहिए।
  • इस रोग से पीड़ित स्त्रियों को दूध की बजाए दही का इस्तेमाल करना चाहिए।
  • स्त्री को गुनगुने पानी में एक चम्मच शहद एवं नींबू का रस मिलाकर पीना चाहिए।
  • इस रोग से पीड़ित स्त्रियों को ज्यादा नमक, मिर्च-मसाले, तले-भुने खाने वाले पदार्थ, चीनी, चाय, काफी, मैदा आदि चीजों का सेवन नहीं करना चाहिए।
  • इस रोग से पीड़ित स्त्रियों को यदि कब्ज हो तो इसका इलाज तुरंत कराना चाहिए।
  • बांझपन को दूर करने के लिए स्त्रियों को विटामिन `सी´ तथा `ई´ की मात्रा वाली चीजें जैसे नींबू, संतरा, आंवला, अंकुरित, गेहूं आदि का भोजन में सेवन अधिक करना चाहिए।
  • स्त्रियों को सर्दियों में प्रतिदिन 5-6 कली लहसुन चबाकर दूध पीना चाहिए, इससे स्त्रियों का बांझपन जल्दी ही दूर हो जाता है।
  • जामुन के पत्तों का काढ़ा बनाकर फिर इसको शहद में मिलाकर प्रतिदिन पीने से स्त्रियों को बहुत अधिक लाभ मिलता है।
  • बड़ (बरगद) के पेड़ की जड़ों को छाया में सुखाकर कूट कर छानकर पाउडर बना लें। फिर स्त्रियां इसे माहवारी समाप्त होने के बाद तीन दिन लगातार रात को दूध के साथ लें। इस क्रिया को तब तक करते रहना चाहिए जब तक की स्त्री गर्भवती न हो जाए।
  • स्त्री के बांझपन के रोग को ठीक करने के लिए 6 ग्राम सौंफ का चूर्ण घी के साथ तीन महीने तक लेते रहने से स्त्री गर्भधारण करने योग्य हो जाती है।
  • स्त्री के बांझपन के रोग को ठीक करने के लिए उसके पेड़ू पर मिट्टी की गीली पट्टी करनी चाहिए तथा इसके बाद उसे कटिस्नान कराना चाहिए और कुछ दिनों तक उसे कटि लपेट देना चहिए। इसके बाद स्त्री को गर्म पानी का एनिमा देना चाहिए।
  • रूई के फाये को फिटकरी में लपेटकर तथा पानी में भिगोकर रात को जब स्त्री सो रही हो तब उसकी योनि में रखें। सुबह के समय में जब इस रूई को निकालेंगे तो इसके चारों ओर दूध की खुरचन की तरह पपड़ी सी जमा होगी। जब तक पपड़ी आनी बंद न हो तब तक इस इस क्रिया को प्रतिदिन दोहराते रहना चाहिए। ऐसा कुछ दिनों तक करने से स्त्री गर्भ धारण करने योग्य हो जाती है फिर इसके बाद स्त्री को पुरुष के साथ संभोग क्रिया करनी चाहिए।
  • स्त्रियों के बांझपन की समस्या को दूर करने के लिए प्राकृतिक चिकित्सा के अनुसार कई प्रकार के आसन भी हैं जिनको करने से उनकी बांझपन की समस्या कुछ ही दिनों में दूर हो सकती है।
  • बांझपन को दूर करने के आसन निम्न हैं- सर्वांगासन, मत्स्यासन, अर्ध मतेन्द्रासन, पश्चिमोत्तानासन, शलभासन आदि।
  • स्त्री में बांझपन का रोग उसके पति के कारण भी हो सकता है इसलिए स्त्रियों को चाहिए कि वह अपने पति का चेकअप कराके उनका इलाज भी कराएं और फिर अपना भी उपचार कराएं।
  • यदि स्त्री-पुरुष दोनों में से किसी के भी प्रजनन अंगों में कोई खराबी हो तो उसका तुरंत ही इलाज कराना चाहिए।

गर्दन में दर्द होने के कारण

गर्दन में दर्द होने के कारण-
  • अपने भोजन में तली-भुनी, ठण्डी-बासी या मसालेदार पदार्थों का अधिक सेवन करने के कारण भी गर्दन में दर्द का रोग हो सकता है।
  • गर्दन में दर्द गलत तरीके से बैठने या खड़े रहने से भी हो जाता है जैसे-खड़े रहना या कूबड़ निकालकर बैठना।
  • भोजन में खनिज लवण तथा विटामिनों की कमी रहने के कारण भी गर्दन में दर्द की समस्या हो सकती है।
  • कब्ज बनने के कारण भी गर्दन में दर्द हो सकता है।
  • पाचनशक्ति में गड़बड़ी हो जाने के कारण गर्दन में दर्द का रोग हो सकता है।
  • अधिक चिंता, क्रोध, ईर्ष्या, शोक या मानसिक तनाव की वजह से भी गर्दन में दर्द हो सकता है।
  • किसी दुर्घटना आदि में किसी प्रकार से गर्दन पर चोट लग जाने के कारण भी गर्दन में दर्द का रोग हो सकता है।
  • अधिक शारीरिक कार्य करने के कारण गर्दन में दर्द हो सकता है।
  • मोटे गद्दे तथा नर्म गद्दे पर सोने के कारण गर्दन में दर्द हो सकता है।
  • गर्दन का अधिक कार्यो में इस्तेमाल करने के कारण गर्दन में दर्द हो सकता है।
  • अधिक देर तक झुककर कार्य करने से गर्दन में दर्द हो सकता है।
  • व्यायाम न करने के कारण भी गर्दन में दर्द हो सकता है।
  • अधिक दवाइयों का सेवन करने के कारण भी गर्दन में दर्द हो सकता है।
  • शारीरिक कार्य न करने के कारण भी यह रोग हो सकता है।
  • चिंता, क्रोध, मानसिक तनाव, ईर्ष्या तथा शोक आदि के कारण भी गर्दन में दर्द हो सकता है।
  • किसी दुर्घटना में गर्दन पर चोट लगने के कारण भी यह रोग हो सकता है।
 उपचार-
  • गर्दन के दर्द को ठीक करने के लिए प्राकृतिक चिकित्सा के अनुसार सबसे पहले रोगी के गलत खान-पान के तरीकों को दूर करना चाहिए और फिर रोगी का उपचार करना चाहिए।
  • इस रोग से पीड़ित रोगी को हमेशा पौष्टिक भोजन करना चाहिए। रोगी को अपने भोजन में विटामिन `डी` लोहा, फास्फोरस तथा कैल्शियम का बहुत अधिक प्रयोग करना चाहिए ताकि हडि्डयों का विकास सही तरीके से हो सके और हडि्डयों में कोई रोग पैदा न हो सके।
  • शरीर में विटामिन `डी` लोहा, फास्फोरस तथा कैल्शियम मात्रा को बनाये रखने के लिए व्यक्ति को अपने भोजन में गाजर, नीबू, आंवला, मेथी, टमाटर, मूली आदि सब्जियों का अधिक सेवन करना चाहिए। फलों में रोगी को संतरा, सेब, अंगूर, पपीता, मौसमी तथा चीकू का सेवन अधिक करना चाहिए।
  • गर्दन में दर्द से पीड़ित व्यक्ति को चोकरयुक्त रोटी व अंकुरित खाना देने से बहुत जल्दी लाभ होता है।
  • गर्दन के दर्द को ठीक करने के लिए प्राकृतिक चिकित्सा के ही एक भाग जल चिकित्सा का सहारा लिया जा सकता है। इस उपचार के द्वारा रोगी को स्टीमबाथ (भापस्नान) कराया जाता है और उसकी गर्दन पर गरम-पट्टी का सेंक करते है तथा इसके बाद रोगी को रीढ़ स्नान कराया जाता है जिसके फलस्वरूप रोगी की गर्दन का दर्द जल्दी ही ठीक हो जाता है। इस प्रकार से उपचार करने से रोगी के शरीर में रक्त-संचालन (खून का प्रवाह) बढ़ जाता है और रोमकूपों द्वारा विजातीय पदार्थ बाहर निकल जाते हैं जिसके फलस्वरूप रोगी की गर्दन का दर्द तथा अकड़न होना दूर हो जाती है।
  • गर्दन के दर्द तथा अकड़न को दूर करने के लिए सूर्य किरणों द्वारा बनाए गए लाल व नारंगी जल का उपयोग करने से रोगी को बहुत अधिक फायदा होता है। सूर्य की किरणों में हडि्डयों को मजबूत करने के लिए विटामिन `डी` होता है। सूर्य की किरणों से शरीर में विटामिन `डी` को लेने के लिए रोगी को पेट के बल खुले स्थान पर जहां पर सूर्य की किरणें पड़ रही हो उस स्थान पर लेटना चाहिए। ताकि सूर्य की किरणें सीधी उसकी गर्दन व रीढ़ की हड्डी पर पड़े। इस क्रिया को करते समय सिर पर कोई कपड़ा रख लेना चाहिए ताकि सिर पर छाया रहें।
  • गर्दन के दर्द को ठीक करने के लिए रोगी की गर्दन पर सरसों या तिल के तेल की मालिश करनी चाहिए। मालिश करते समय यह ध्यान देना चाहिए कि मालिश हमेशा हल्के हाथों से करनी चाहिए। मालिश यदि सूर्य की रोशनी के सामने करें तो रोगी को बहुत अधिक लाभ मिलता है।
  • योगासन के द्वारा भी गर्दन के दर्द तथा अकड़न को ठीक किया जा सकता है। योगासन द्वारा गर्दन के दर्द तथा अकड़न को ठीक करने के लिए सबसे पहले गर्दन को पीछे की ओर ले जाएं और फिर धीरे-धीरे गर्दन को आगे की ओर झुकाएं। फिर ठोड़ी को कंठ कूप से लगाएं। इसके कुछ देर बाद गर्दन को दाएं से बाएं तथा फिर बाएं से दाएं हल्के झटके के साथ घुमाएं।
  • गर्दन के दर्द तथा अकड़न को दूर करने के लिए भुजंगासन, धनुरासन या फिर सर्पासन करना लाभकारी रहता है।
  • गर्दन के दर्द तथा अकड़न को ठीक करने के लिए प्राणायाम ध्यान का अभ्यास करें।
  • गर्दन के दर्द तथा अकड़न की समस्या को दूर करने के लिए रोजाना सुबह के समय में खुली ताजी हवा में घूमें।
  • गर्दन में दर्द होने पर इसका उपचार करने के लिए सबसे पहले गर्दन में दर्द होने के कारणों को दूर करना चाहिए।
  • योगाभ्यास तथा विशेष व्यायाम से गर्दन के दर्द से पूरी तरह छुटकारा मिल सकता है।
  • गर्दन के दर्द से पीड़ित रोगी को अपने कंधों को ऊपर से नीचे की ओर करना।
  • कंधों को सामने तथा पीछे की ओर गतिशील करना चाहिए इससे गर्दन का दर्द ठीक हो जाता है।
  • कंधों को घड़ी की दिशा में सीधी तथा उल्टी दिशा में घुमाना चाहिए जिससे गर्दन कां दर्द ठीक हो जाता है।
  • गर्दन से पीड़ित रोगी को अपनी उंगुलियों को गर्दन के पीछे आपस में फंसाना चाहिए और फिर फंसी उंगुलियों की तरफ दबाव देते हुए अपने कोहनी को आगे से पीछे की ओर गतिशील करना चाहिए जिसके फलस्वरूप गर्दन का दर्द जल्दी ही ठीक हो जाता है।
  • गर्दन से पीड़ित रोगी को अपने भोजन में विटामिन `डी´, लोहा, कैल्शियम, फास्फोरस की अधिकता वाले खाद्य पदार्थों का अधिक उपयोग करना चाहिए।
  • संतरा, सेब, मौसमी, अंगूर तथा पपीता व चीकू का उपयोग भोजन में अधिक करना चाहिए।
गर्दन में दर्द तथा अकड़न से बचने के लिए कुछ सावधानियां-
  • सोने के लिए व्यक्ति को सख्त तख्त का ही प्रयोग करना चाहिए।
  • सोते समय गर्दन के नीचे तकिए का प्रयोग नहीं करना चाहिए।
  • किसी भी कार्य को करते समय अपनी रीढ़ की हड्डी को तनी हुई और बिल्कुल सीधी रखनी चाहिए।
  • गर्दन के दर्द तथा अकड़न का उपचार करते समय अधिक सोच-विचार नहीं करना चाहिए।
  • गर्दन में दर्द तथा अकड़न की समस्या से बचने के लिए वह कार्य नहीं करना चाहिए जिससे गर्दन या आंखों पर अधिक बोझ या तनाव पड़े।
  • गर्दन में दर्द तथा अकड़न की समस्या से बचने के लिए प्रतिदिन 6 से 8 घण्टे की तनाव रहित नींद लेना बहुत ही जरूरी है।
  • गर्दन के दर्द तथा अकड़न से बचने के लिए यह ध्यान देना चाहिए कि यदि खड़े है तो तनकर खड़े हो तो अपनी पीठ सीधी रखनी चाहिए।
  • आगे की ओर झुककर किसी भी कार्य को नहीं करना चाहिए।
जानकारी-
           इस प्रकार से कुछ नियमों का अपने जीवन में प्रयोग करने से गर्दन में कभी भी दर्द तथा अकड़न नहीं होता है। यदि गर्दन में दर्द तथा अकड़न हो भी गई है तो संतुलित भोजन का सेवन करके तथा प्राकृतिक चिकित्सा से उपचार करके जल्दी ही इस रोग को ठीक किया जा सकता है।

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