गुरुवार, 25 सितंबर 2014

भृंगराज

          
भृंगराज के पौधे वर्षा के मौसम में खेतों के किनारे ,रेल लाइन के किनारे, खाली पड़ी जमीन पर ,बाग़ बगीचों में खुद ही उग जाते हैं। ये हमेशा हरे रहते हैं।इनके फूल पत्ते तने जड़ सब उपयोगी हैं। इनकी झाड़ियाँ ज्यादा से ज्यादा आधा मीटर तक उंची मिलेंगी।
इस पौधे में बीटा-एमिरीन ,विडेलोलेक्टोंन, ग्लूकोसैड्स-फायटोस्टीराल-ए , ल्यूतियोलिन, फैटिक एसिड ,पामीटिक एसिड, ट्रायतर्पेनीक एसिड, स्टीयरिक एसिड,लिनोलिक एसिड और आलिक एसिड , एकलिप्तींन ,एम्पलिप्तींन एल्केलायद ,निकोटीन और राल जैसे तत्व मौजूद हैं।
 
----पीलिया एक जानलेवा रोग है ,लेकिन आप रोगी को पूरे  भृंगराज के  पौधे का चूर्ण मिश्री के साथ खिला दीजिये 100 ग्राम चूर्ण पेट में पहुंचाते ही पीलिया ख़त्म . या फिर भृंगराज के पौधे को ही क्रश करके 10 ग्राम रस निकालिए ,उसमें 1 ग्राम काली मिर्च का पावडर मिलाकर मरीज को पिला दीजिये .दिन में 3 बार ,3 दिनों तक इस मिश्रण में थोड़ा मिश्री का चूर्ण भी मिला लीजियेगा ।
----बाल काले रखने हैं तो भृंगराज की ताजी पत्तियों का रस रोजाना सिर  पर मल कर सोयें।
----गुदाभ्रंश हो गया हो तो भृंगराज की जड़ और हल्दी की चटनी को मलहम की  तरह मलद्वार पर लगाए इससे कीड़ी काटने की बीमारी मेंभी आराम मिलता है .गुदा भ्रंश में मल द्वार थोड़ा बाहर निकल आता है.
----पेट बहुत खराब हो तो भृंगराज कीपत्तियों का रस या चूर्ण दस ग्राम लीजिये उसे एक कटोरी दही में मिला कर खा जाएँ ,दिन में दो बार ३ दिनों तक .
----आँखों की रोशनी तेज रखनी है तो भृंगराज  की पत्तियों का ३ ग्राम पाउडर १ चम्मच शहद में मिला कर रोज सुबह खाली  पेट खाएं।
----भृंगराज सफ़ेद दाग का भी इलाज करता है मगर काली पत्तियो और काली शाखाओं वाला भृंगराज चाहिए।इसे आग पर सेंक कर रोज खाना होगा ,एक दिन में एक पौधा लगभग चार माह तक लगातार खाए।
----जिन महिलाओं को गर्भस्राव की बिमारी है उन्हें गर्भाशय को शक्तिशाली बनाने के लिए भृंगराज की ताजी पत्तियों का ५-६ ग्राम रस रोज पीना चाहिये
----त्रिफला के चूर्ण को भृंगराज  के रस की ३ बार भावना देकर सुखा कर रोज आधा चम्मच पानी के साथ निगलने से बाल कभी सफ़ेद होते ही नही। इसे किसी जानकार वैद्य से ही तैयार कराइये.
----अगर कोई तुतलाता हो तो इसके पौधे के रस में देशी घी मिला कर पका कर दस  ग्राम रोज पिलाना चाहिए ,एक माह तक लगातार।
----इसके रस में यकृत की सारी बीमारियाँ ठीक कर देने का गुण मौजूद है लेकिन जिस दिन इसका ताजा रस दस ग्राम  पीजिये उस दिन सिर्फ दूध पीकर रहिये भोजन नहीं करना है ,यदि यह काम एक माह तक लगातार कर लिया जाय तो कायाकल्प भी सम्भव है।यह एक कठिन तपस्या है.
----अब इसका सबसे महत्वपूर्ण उपयोग सुनिए- बच्चा पैदा होने के बाद महिलाओं को योनिशूल बहुत परेशान करता है,उस दशा में भृंगराज के पौधे की जड़ और बेल के पौधे की जड़ का पाउडर बराबर मात्रा में लीजिये और शहद के साथ खिलाइये ,५ ग्राम पाउडर काफी होगा ,दिन में एक बार खाली पेट लेना है ७ दिनों तक .
     

ज़रूरी है combinations समझना



अगर कोई क्रिकेट खेलने मैदान में उतरे, और आप उसे टेबल-टेनिस की बैट थमा दें, तो बेचारा १ रन भी न बना पाए.
वैसे ही क्रिकेट के बल्ले से कोई टेनिस नहीं खेल सकता. चीज़ों का यथोचित combination बहुत ही आवश्यक होता है.
ये नियम सुलभ स्वस्थ्य के लिए भी लागू होते हैं. कई बार दादी-नानी से सुना होगा आपने कि 'फलां' खाके 'फलां' नहीं खाते, 'फलां' नहीं पीते. सदियों के अनुभव से जुड़ी हैं हमारी दादी-नानियों की ये बातें, जो आजकल की दौर में हम नज़र-अंदाज़ करते जा रहे हैं.

सबसे पहले मैं एक उदाहरण अपने आयुर्वेद से ही लेता हूँ:

सिंधूत्शर्कराशुण्ठीकणामधुगुडै: क्रमात ।
वर्षादिष्वभयाभ्यस्ता रसायन गुणैषिणा ।। (योगरत्नाकर: ४९९)

हरीतकी/हर्रे को आयुर्वेद में माँ का दर्ज़ा दिया गया है, जो शरीर की दुर्बलता नष्ट करके दीर्घायु प्रदान करती है. परन्तु हरीतकी को भी विशेष combinations के साथ लेनेका सुझाव बताया गया है, जो इस प्रकार है:
१) वर्षा ऋतु में 'सैन्धव' नमक के साथ
२) हेमंत ऋतु में 'शक्कर' के साथ
३) शरद ऋतु (पूर्वार्ध) में अदरक के साथ
४) शरद ऋतु (शेषार्ध) में पिप्पली/ पेप्पर के साथ (जो सोंठ के साथ अक्सर आचारों में डाला जाता हैं)
५) वसंत ऋतु में मधु के साथ
६) ग्रीष्म ऋतु में गुड़/मिट्ठे के साथ

 ये तो हुआ एक उदाहरण. अब ज़रा अपनी वैज्ञानिक दृष्टि डाली जाए. एक बात तो तय है कि विभिन्न ऋतुओं में बाह्य तापमान और आद्रता के साथ शरीर को समन्वय बिठाना पड़ता है.

जाड़े में शरीर को अंदरूनी गर्मी की ज़रुरत होती है, अतः glucose और fat metabolism तेज़ होता है. ऐसे में खाने में gluocose तथा fat से परिपूर्ण चीज़ों का प्रयोग करना चाहिए. इसीलिए कहते हैं की जाड़े में मेवे-मिष्टान्न, dry fruits इत्यादि छक कर खाना चाहिए. इसी लिस्ट में गोंद तथा तिल भी आते हैं मगर इनका combination होना चाहिए मधु या गुड़ के साथ. मकर संक्रांति में तिल के लड्डू (गुड़ के पार वाले) खाने का विधान है. इसका मतलब ये नहीं कि १४ जनवरी को खाया और हो गया. ये तो बस सबब है याद रखने का ताकि लोग तिल-गोंद-गुड़ इत्यादि का सेवन अधिक से अधिक इस ऋतु में कर सकें.
इसके विपरीत, गर्मी के समय में ये metabolism बहुत धीमी पड़ जाती है. ऊपर से स्वेद/पसीने के कारण काफी लवणों का क्षय भी होता है शरीर में. सैन्धव तथा काले नमक में दर्जनों किस्म के लावन मौजूद होते हैं जो शरीर के metabolism को सुचारू रूप से चलने में मदद करते हैं. ग्रीष्म ऋतु में गरिष्ठ भोजन (अत्यधिक मात्र में मेवे मिष्टान्न, dry-fruits इत्यादि) पाचन तंत्र के लिए हानिकारक है.

प्राकृतिक चिकित्सा से जहर का नशा उतारने के लिए उपचार


प्राकृतिक चिकित्सा से जहर का नशा उतारने के लिए उपचार निम्नलिखित हैं-

•यदि किसी व्यक्ति ने शीशे का चूरा खा लिया है तो उस व्यक्ति का इलाज प्राकृतिक चिकित्सा से करने के लिए उसको दही पिलाना चाहिए। फिर रोगी को उल्टी कराने का प्रयास करना चाहिए। उल्टी करने से रोगी के पेट से शीशे का चूरा बाहर निकल जाता है।
•यदि कोई व्यक्ति तेजाब या किसी प्रकार का जहर खा लेता है तो रोगी व्यक्ति को दूध या पानी में अण्डे की सफेदी अच्छी तरह फेंटकर या फिर दूध या ठंडा पानी कई बार काफी मात्रा में पिलाना चाहिए। फिर इसके बाद उतना दूध अन्तड़ियों में पहुंचाना चाहिए जितना रोगी रोक सके। उसके बाद रोगी की गर्दन के सामने वाले हिस्से पर मिट्टी की उष्ण गीली मिट्टी लगानी चाहिए। इस प्रकार से रोग का इलाज प्राकृतिक चिकित्सा से करने से रोगी के शरीर से जहर का असर खत्म हो जाता है।
•यदि कोई व्यक्ति किसी भी प्रकार का जहर खा लेता है तो उसे तुरंत उल्टी कराकर पेट में गए जहर को निकाल देना चाहिए। इसके लिए गर्म पानी में अधिक मात्रा में नमक मिलाकर प्रत्येक 5 मिनट के बाद रोगी को पिलाते रहना चाहिए और फिर रोगी के हलक में उंगुली आदि डालकर उल्टी करनी चाहिए। रोगी व्यक्ति को बार-बार उल्टी करानी चाहिए। इसके बाद उसे नमक मिले गुनगुने पानी से एक या दो बार गरारा कराना चाहिए। फिर रोगी व्यक्ति को उदरस्नान तथा भापस्नान कराना चाहिए। इस प्रकार से रोगी का इलाज प्राकृतिक चिकित्सा से करें तो रोगी के शरीर से जहर का असर कम हो जाता है।
•यदि किसी व्यक्ति ने अफीम का जहर खा लिया है तो उसका जहर उतारने के लिए हींग को छाछ में घोलकर पिलाना चाहिए या फिर जामुन के पत्तों का रस पिलाना चाहिए। इस प्रकार से रोगी का इलाज प्राकृतिक चिकित्सा से करें तो रोगी के शरीर से जहर का असर कम हो जाता है।
•यदि किसी व्यक्ति ने धतूरे का जहर खा लिया है तो उस व्यक्ति के शरीर से जहर के असर को खत्म करने के लिए रोगी को नमक मिला पानी पिलाना चाहिए या गूलर की जड़ की छाल को कालीमिर्च के साथ पीसकर पिलानी चाहिए। इस प्रकार से रोगी का इलाज प्राकृतिक चिकित्सा से करें तो रोगी के शरीर में जहर का असर कम हो जाता है और कुछ ही समय में रोगी व्यक्ति ठीक हो जाता है।
•यदि किसी व्यक्ति ने संखिया का जहर खा लिया है तो उसके शरीर में फैले जहर के असर को खत्म करने के लिए कड़वी नीम की पत्तियों को गर्म पानी के साथ पीसकर पिलाना चाहिए या फिर दूध में घी मिलाकर पिलाना चाहिए। इस प्रकार से रोगी का इलाज प्राकृतिक चिकित्सा से करें तो रोगी के शरीर से जहर का असर कम हो जाता है।
•यदि किसी व्यक्ति ने बहुत अधिक भांग खा ली हो जिसके कारण रोगी व्यक्ति को बहुत ज्यादा नशा चढ़ गया हो तो रोगी व्यक्ति का इलाज करने के लिए उसे अरहर की दाल की धोवन का पानी पिलाना चाहिए। व्यक्ति को अरहर की दाल के धोवन को पिलाने से भांग का नशा कम हो जाता है।
•यदि किसी व्यक्ति ने पारे या जस्ते का जहर खा लिया है तो उस व्यक्ति के शरीर से जहर का असर खत्म करने के लिए उसे गेहूं के आटे को पानी में घोलकर पिलाने से जहर उतर जाता है।
•यदि किसी व्यक्ति ने कुचला का जहर खा लिया है तो उसके शरीर से जहर के असर को खत्म करने के लिए उसे घी मिला दूध पिलाना चाहिए या फिर जामुन की गुठली का 10 ग्राम चूर्ण फांककर पानी में मिलाकर पीने से जहर उतर जाता है। इस प्रकार से रोगी का इलाज प्राकृतिक चिकित्सा से करें तो रोगी के शरीर में जहर का असर कम हो जाता है रोगी व्यक्ति ठीक हो जाता है।

हिचकी को ठीक करने के लिए प्राकृतिक चिकित्सा से उपचार




•जब हिचकी आए तो उस समय एक गिलास गर्म पानी पीने से यह रोग ठीक हो जाता है।
•इस रोग को ठीक करने के लिए पेट की सिंकाई तथा पेट पर ठंडे लपेट का प्रयोग करना चाहिए। ऐसा करने से पेट के डायाफ्रॉम पर दबाव कम हो जाता है जिसके फलस्वरूप हिचकी बंद हो जाती है।
•हिचकी आने पर लम्बी तथा गहरी सांस लेने से हिचकी बंद हो जाती है।
•अपना ध्यान किसी दूसरी चीजों पर केन्द्रित करने से हिचकी आना बंद हो जाती है।
•बर्फ के छोटे-छोटे टुकड़े को मुंह में रखकर चूसने से हिचकी आना बंद हो जाती है।
•हिचकी आने पर 1 चम्मच चीनी या शहद का सेवन करने से यह रोग तुरंत ठीक हो जाता है।
•एक गिलास गर्म पानी में 1 चम्मच शहद डालकर उस पानी को पीने से हिचकी बंद हो जाती है।
•छोटी इलायची और तुलसी के पत्तों को एकसाथ पीसकर पानी में मिलाकर पीने से हिचकी बंद हो जाती है।
•2-3 लौंग को चबाकर उसके ऊपर पानी पीने से हिचकी बंद हो जाती है।


बुधवार, 24 सितंबर 2014

चेहरे पर काले या फिर भूरे रंग के दाग पड़ जाना

हलजन की सिहुली

          इस रोग से पीड़ित रोगी के चेहरे पर काले या फिर भूरे रंग के दाग पड़ जाते हैं। हलजन की सिहुली एक चर्म रोग है। इस रोग से पीड़ित रोगी के चेहरे के दाग कभी-कभी बढ़कर पूरे शरीर में फैल जाते हैं।
हलजन की सिहुली रोग होने का कारण-
           इस रोग के होने का सबसे प्रमुख कारण अनुचित खान-पान (सही तरीके से भोजन न खाना) तथा अनुचित रहन-सहन (ठीक तरीके से जीवन न जीना) है, जिसके कारण खून (रक्त) दूषित (जहरीला) हो जाता है और व्यक्ति के चेहरे पर हलजन की सिहुली रोग हो जाता है।

हलजन की सिहुली रोग का प्राकृतिक चिकित्सा से उपचार-

•हलजन की सिहुली रोग को ठीक करने के लिए सबसे पहले रोगी व्यक्ति को कुछ दिनों तक फलों का सेवन करके उपवास रखना चाहिए। रोगी व्यक्ति को उपवास रखने के साथ-साथ एनिमा क्रिया करनी चाहिए। इसके साथ-साथ प्रतिदिन 15 मिनट से 30 मिनट तक सुबह तथा शाम के समय में धूपस्नान करना चाहिए। इसके बाद सप्ताह में एक बार पूरे शरीर पर भाप से स्नान (गर्म पानी के भाप को पूरे शरीर पर लगाना) करना चाहिए। इसके बाद महीने में 1-2 बार पेड़ू स्नान (नाभि को पानी से धोना) सुबह तथा शाम के समय में 10 से 15 मिनट तक करना चाहिए।
•हलजन की सिहुली रोग से पीड़ित रोगी को रात को सोने से पहले मिट्टी की गीली पट्टी से अपने पेडू पर लेप करना चाहिए।
•हलजन की सिहुली रोग से पीड़ित रोगी को प्रतिदिन 1 गिलास गुनगुने पानी में 1-2 कागजी नींबू के रस को मिलाकर पीना चाहिए।
•आसमानी और पीली बोतलों के सूर्यतप्त जल को लगभग 25 ग्राम की मात्रा में समान मात्रा में लेकर एक दिन में 6 बार पीना चाहिए।
•हलजन रोग से पीड़ित रोगी को अपने चेहरे पर हरे रंग की बोतलों का सूर्यतप्त जल कुछ मात्रा में लेकर चेहरे पर मालिश करनी चाहिए।
•हलजन रोग से पीड़ित रोगी को हमेशा शुद्ध, सादा तथा ताजा भोजन करना चाहिए।

फोड़ा



          इस रोग के कारण रोगी व्यक्ति के शरीर पर बड़े-छोटे दाने निकल जाते हैं जिनमें पीब तथा मवाद भरी रहती है। इस रोग के कारण फोड़े में गांठ भी पड़ जाती है तथा कुछ दिनों के बाद ये गांठ मुलायम पड़ जाती है तथा उसमें पीब और दूषित रक्त भर जाता है। इसी को फोड़ा कहते हैं। जब यह फूट जाता है तो इसमें से दूषित पदार्थ पीब और विषैला रक्त (खून) निकलने लगता है।

          फोड़ा छोटे तथा बड़े दोनों ही रूप में हो सकता है। इस रोग से पीड़ित रोगी को बुखार तथा कब्ज की शिकायत भी हो सकती है। ये फोड़े कभी-कभी 2-3 दिनों में अपने आप ठीक हो जाते हैं तो कुछ जल्दी ठीक नहीं होते हैं। जब फोड़ा फूट जाता है तो 7 से 10 दिनों तक यह सूख जाता है। जब फोड़े के साथ छेड़छाड़ करते है तो यह असाधारण रूप ले लेता है और यह नासूर, नहरूआ तथा कैंसर आदि रोगों का रूप ले लेता है और बहुत अधिक दर्दनाक हो जाता है।

फोड़ा होने का कारण:-

            फोड़ा होने का सबसे प्रमुख कारण शरीर में दूषित द्रव्य का जमा हो जाना है। जब रक्त में दूषित द्रव्य मिल जाते हैं तो शरीर के किसी कमजोर भाग पर यह दाने के रूप में निकलने लगते हैं और उसमें मवाद या पीब भर जाती है। फोड़ा में गांठ भी बन जाती है तथा रोग ग्रस्त भाग कभी-कभी लाल रंग का हो जाता है और उस स्थान पर जलन, खाज तथा दर्द भी होने लगता है।

फोड़े का प्राकृतिक चिकित्सा से उपचार:-

•फोड़े का प्राकृतिक चिकित्सा से उपचार करने के लिए सबसे पहले रोगी व्यक्ति का फोड़ा जब तक पक न जाए तब तक उस पर प्रतिदिन 2-3 बार गुनगुना पानी छिड़कना चाहिए या फिर 10 मिनट तक 2-3 बार कम से कम 2 घण्टे तक बदल-बदल कर गर्म मिट्टी का लेप करना चाहिए या फिर कपड़े की गीली पट्टी करनी चाहिए। जब फोड़ा पक जाए तो उसे फोड़कर उसकी पीब तथा जहरीले रक्त को बाहर निकाल देना चाहिए। इसके बाद नीम की पत्तियों को पीसकर लेप बनाकर फोड़े पर लगाएं तथा कपड़े से पट्टी कर लें। इस प्रकार से प्रतिदन पट्टी करने से फोड़ा कुछ ही दिनों में ठीक हो जाता है।
•रोगी व्यक्ति को प्रतिदिन गुनगुने पानी से एनिमा क्रिया करनी चाहिए ताकि उसका पेट साफ हो सके तथा दूषित द्रव्य उसके शरीर से बाहर निकल सके।
•नींबू के रस को पानी में मिलाकर उस पानी से फोड़े को धोना चाहिए तथा इसके बाद फोड़े पर कपड़े की पट्टी कर लेनी चाहिए। जब फोड़ा पीबयुक्त हो जाए तो उस पर कम से कम 5 मिनट तक गर्म पानी में भीगे कपड़े की पट्टी करनी चाहिए। इसके बाद फोड़े को फोड़कर पीब तथा जहरीले रक्त को बाहर निकाल देना चाहिए और फिर इसके बाद ठंडे पानी में भीगे कपड़े से दिन में 3-4 बार सिंकाई करनी चाहिए। इससे फोड़ा जल्द ही ठीक हो जाता है।
•जब फोड़ा फूट जाए तो दिन में 2 बार उस पर हल्की भाप देकर बलुई मिट्टी की भीगी गर्म पट्टी या कपड़े की भीगी पट्टी बदल-बदलकर लगानी चाहिए। इसके बाद जब उस पट्टी को खोलें तो उसे ठंडे पानी से धोकर ही खोलना चाहिए।
•जब रोगी के शरीर में अधिक संख्या में फोड़े निकल रहे हों तो उस समय रोगी व्यक्ति को 2 दिनों तक उपवास रखना चाहिए तथा फलों का रस पीना चाहिए तथा दिन में गुनगुने पानी से एनिमा क्रिया करनी चाहिए। इसके साथ-साथ रोगी व्यक्ति को नींबू का रस पानी में मिलाकर पीना चाहिए। रोगी व्यक्ति को सप्ताह में 1 बार फोड़ों पर ठंडी पट्टी रखकर स्नान करना चाहिए तथा पैरों को गर्म पानी से धोना चाहिए। रोगी व्यक्ति को प्रतिदिन 2 बार कटिस्नान तथा मेहनस्नान करना चाहिए। रात के समय में रोगी व्यक्ति को अपने पेट पर मिट्टी की गर्म पट्टी रखनी चाहिए। इसके अलावा रोगी को गुनगुने पानी से स्नान करना चाहिए तथा तौलिये से अपने शरीर को पोंछना चाहिए। फोड़े पर हरा प्रकाश देकर नीला प्रकाश भी देना चाहिए। इस प्रकार से प्राकृतिक चिकित्सा से उपचार करने से फोड़ा जल्दी ठीक हो जाता है।
•फोड़ों को मक्खी आदि से बचाने के लिए उन पर नारियल के तेल में नींबू का रस मिलाकर लगाना चाहिए और इसके साथ-साथ इसका प्राकृतिक चिकित्सा से उपचार करना चाहिए। इससे फोड़ा जल्दी ही ठीक हो जाता है।
•सुबह के समय में नीम की 4-5 पत्तियां चबाने से फोड़ा जल्दी ही ठीक हो जाता है।

हकलाना तथा तुतलाना



          हकलाने या तुतलाने का रोग अधिकतर नाड़ियों में किसी प्रकार से दोष उत्पन्न होने के कारण होता है। यह रोग उन व्यक्तियों को भी हो जाता है जो एक हकलाने वाले व्यक्ति की नकल करते रहते हैं।

हकलाने तथा तुतलाने के लक्षण:-

          बोलते समय ठीक तरह से अक्षरों को न बोल पाना तथा रुक-रुककर बोलना, तुतलाने या हकलाने का रोग कहलाता है। कुछ रोगियों में तो हकलाहट जरा सी होती है, जो धीरे-धीरे अपने आप ठीक हो जाती है। लेकिन कुछ मामलों में जब यह रोग पुराना हो जाता है तो रोगी को बोलने में बहुत परेशानी होती है।

हकलाना तथा तुतलाने का कारण:-

          जब किसी व्यक्ति की पेशियों तथा स्नायुओं का नियंत्रण दोषपूर्ण हो जाता है तो वह व्यक्ति बोलते समय शब्दों का उच्चारण ठीक तरह से नहीं कर पाता है और वह रुक-रुककर बोलने लगता है। इस रोग के हो जाने के कारण रोगी की जीभ और होठों की आवश्यक गतिशीलता जो बोलने में उपयोग होती है तथा कठिनाई से पूरी होती है। इसके साथ ही स्वर यंत्र में आवाज पैदा हो जाती है जिसके कारण व्यक्ति तुतलाने लगता है। हकलाने के रोग में व्यक्ति को हर शब्द में तो नहीं पर कुछ शब्दों को बोलने में परेशानी होती है।

हकलाने तथा तुतलाने का प्राकृतिक चिकित्सा से उपचार :-

•यदि कोई बच्चा हकलाने या तुतलाने के रोग से पीड़ित है तो उसके रोग को ठीक करने के लिए, उसे कुछ दिनों तक आंवला चबाने के लिए देना चाहिए। जिसके फलस्वरूप रोगी की जीभ पतली होकर उसकी आवाज साफ निकलने लगती है।
•इस रोग से पीड़ित रोगी को सुबह के समय में 10 भिगोए हुए बादाम को छीलकर और पीसकर मक्खन, मिश्री के साथ सेवन करना चाहिए। इससे यह रोग कुछ ही दिनों में ठीक हो जाता है।
•रोगी व्यक्ति यदि प्रतिदिन 10 कालीमिर्च के दाने और बादाम की गिरी को पीसकर मिश्री में मिलाकर चाटे तो उसका तुतलाने तथा हकलाने का रोग ठीक हो जाता है।
•रोजाना गाय के घी में आंवले का चूर्ण मिलाकर चाटने से भी तुतलाना तथा हकलाना दूर हो जाता है।
•छुहारे को दूध में उबालकर और चबाकर खा ले तथा इसके बाद दूध पी लें। इसके बाद दो घंटे तक कुछ नहीं खाना चाहिए। इससे आवाज बिलकुल साफ हो जाती है। यह क्रिया कुछ दिनों तक प्रतिदिन करने से रोगी का तुतलाना तथा हकलाना ठीक हो जाता है।
•तुतलाने तथा हकलाने का प्राकृतिक चिकित्सा से उपचार करने के लिए रोगी व्यक्ति को कुछ दिनों तक फलों का रस (गाजर, सेब, चुकन्दर, अनन्नास, संतरा) पीकर उपवास रखना चाहिए। इसके बाद कुछ दिनों तक रोगी को फल, सब्जी, अंकुरित दाल का सेवन करना चाहिए। इससे रोगी को बहुत लाभ मिलता है।
•इस रोग से पीड़ित रोगी को भोजन में कॉफी, चाय, मैदा, रिफाइण्ड, चीनी, डिब्बाबंद खाद्य पदार्थों का सेवन नहीं करना चाहिए।
•सोयाबीन को दूध में डालकर उसमें शहद मिलाकर प्रतिदिन सेवन करने से स्नायु की सूजन ठीक हो जाती है। इससे हकलाने तथा तुतलाने का रोग बिल्कुल ठीक हो जाता है।
•पानी में नमक डालकर प्रतिदिन स्नान करने से रोगी का तुतलाने तथा हकलाने का रोग दूर हो जाता है।
•इस रोग से पीड़ित रोगी को सुबह के समय में प्रतिदिन नियमित रुप से कोई हल्का व्यायाम करना चाहिए, जिससे स्नायु को शक्ति मिल सके और वह सही तरीके से अपना कार्य कर सके। इस रोग से पीड़ित रोगी को सुबह तथा शाम के समय में खुली हवा में टहलने से बहुत अधिक लाभ मिलता है।
•इस रोग से पीड़ित रोगी को गहरी नींद लेनी चाहिए तथा कम से कम 7-8 घंटे तक सोना चाहिए।
•इस रोग से पीड़ित रोगी को प्राकृतिक चिकित्सा से उपचार कराते समय अपनी सभी मानसिक परेशानियों, भय, चिंता आदि को दूर कर देना चाहिए।
•यदि रोगी व्यक्ति किसी कार्य को करते समय जल्दी थक जाता हो तो उसे वह कार्य नही करना चाहिए।
•प्रतिदिन शुष्कघर्षण आसन करने तथा इसके बाद साधारण स्नान करने से हकलाने तथा तुतलाने का रोग जल्दी ही ठीक हो जाता है।
•इस रोग से पीड़ित रोगी को झगड़ा-झंझट, वैवाहिक जीवन की असंगति, पारिवारिक क्लेश, आर्थिक कठिनाइयां, प्रेम सम्बन्धी निराशा, यौन सम्बन्धी कुसंयोजन तथा क्रोध, भय आदि मानसिक कारणों से दूर रहना चाहिए क्योंकि इन सभी कारणों से रोग की अवस्था और भी गम्भीर हो सकती है।
•शहद में कालीमिर्च मिलाकर प्रतिदिन चाटने से हकलाना तथा तुतलाना ठीक हो जाता है।
•रात को सोते समय भुनी हुई फिटकरी को मुंह में रखकर सो जाएं और सुबह के समय में उठकर कुल्ला कर लें। इस क्रिया को लगभग एक महीने तक करने से हकलाने तथा तुतलाने का रोग ठीक हो जाता है।
•इस रोग से पीड़ित रोगी को खाना खाने के बाद अपने मुंह में छोटी इलायची तथा लौंग रखनी चाहिए तथा जीभ को प्रतिदिन साफ करना चाहिए और यदि कब्ज की शिकायत हो तो उसे दूर करना चाहिए।
•हकलाने और तुतलाने के रोग से पीड़ित रोगी को मन से भय की भावना बिल्कुल निकाल देनी चाहिए तथा मन को सबल बनाना चाहिए।
•इस रोग से पीड़ित रोगी को रात के समय में शंख में पानी भरकर फिर सुबह के समय में उठकर उस पानी को प्रतिदिन पीने से यह रोग ठीक हो जाता है।
•प्रतिदिन एनिमा लेने से तथा इसके बाद गुनगुने पानी से गरारा करने से रोगी का गला साफ हो जाता है और उसका तुतलाना तथा हकलाना बंद हो जाता है।
•जबड़ों की पेशियों के कड़ेपन और होठों की गतिमन्दता के कारण भी हकलाने तथा तुतलाने का रोग हो जाता है, इसलिए रोग का उपचार करने के लिए रोगी व्यक्ति को अपने हाथ की तर्जनी उंगुली को मुंह में डालकर नीचे के जबड़े को धीरे-धीरे नीचे की ओर ले जाना चाहिए। इसके बाद पेशियों को ढीला छोड़ देना चाहिए, जिससे जबड़ा अपने ही भार से नीचे की ओर चला जाए। जब यह क्रिया कर रहे हो उस समय गले में कोई गति नहीं होनी चाहिए। इस प्रकार के व्यायाम प्रतिदिन करने से यह रोग कुछ ही दिनों में ठीक हो जाता है।
•हकलाने तथा तुतलाने के रोग को ठीक करने के लिए रोगी व्यक्ति को एक कुर्सी पर लिटाकर शरीर को सीधा तथा ढीला छोड़ देना चाहिए। उसके बाद चेहरे की पेशियों को ढीली करके जबड़े को नीचे गिरने देना चाहिए। इस अवस्था में रोगी व्यक्ति को अपनी जीभ मुंह की तली से सटाकर रखनी चाहिए। इस व्यायाम को प्रतिदिन करने से यह रोग कुछ ही दिनों में ठीक हो जाता है।
•रोगी व्यक्ति को अपने मुंह की पेशियों को ठीक करने के लिए प्रतिदिन शीशे के सामने 15 मिनट तक खड़े होकर या बैठकर जोर-जोर से कुछ पढ़ना चाहिए और उस समय गहरी सांस लेनी चाहिए। रोगी को पढ़ते समय प्रत्येक शब्द का उच्चारण सही करने की कोशिश करनी चाहिए। इस प्रकार से उपचार प्रतिदिन करने से कुछ ही दिनों में हकलाने तथा तुतलाने का रोग ठीक हो जाता है।
•इस रोग को ठीक करने के लिए कई प्रकार के आसन हैं। इन आसनों के करने से हकलाना तथा तुतलाना ठीक हो जाता है। ये आसन इस प्रकार हैं- उष्ट्रासन, हलासन, मण्डूकासन, मत्स्यासन, सुप्तवज्रासन, जानुशीर्षासन, सिंहासन, धुनरासन तथा खेचरी मुद्रा आदि।
•किसी भी ठीक व्यक्ति को हकलाने वाले व्यक्ति की नकल नहीं करनी चाहिए क्योंकि ऐसा करने से उसे भी हकलाने की आदत पड़ सकती है।

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