शुक्रवार, 26 सितंबर 2014

जल में डूबना



           यदि कोई व्यक्ति पानी में डूब रहा हो तो सबसे पहले उस व्यक्ति को पानी से बाहर निकालकर उसके शरीर में भरा हुआ पानी बाहर निकालना चाहिए।

पानी में डूबने से बचाने के बाद रोगी व्यक्ति का प्राकृतिक चिकित्सा से उपचार-
         सबसे पहले पानी में डूबे व्यक्ति को पीठ के बल लिटा देना चाहिए। फिर इसके बाद रोगी व्यक्ति की छाती को जोर-जोर से दबाना चाहिए ताकि रोगी व्यक्ति के पेट से पानी बाहर निकल सके। फिर इसके बाद रोगी व्यक्ति की सांसों को जोड़ने का प्रयास करना चाहिए। फिर उसके शरीर में गरमाई लाने का प्रयत्न करना चाहिए। रोगी व्यक्ति के शरीर में गर्माहट लाने के लिए रोगी के पेट के ऊपरी भाग पर दोनों बगलों में, पैर के तलवों के ऊपर तथा उनके नीचे गर्म जल से भरी बोतलें या फिर गर्म बालू से भरी पोटलियां रखकर पूरे शरीर को कम्बल से ढकना चाहिए और इसके बाद जब रोगी की इच्छा हो तब उसे 2-3 चम्मच गर्म पानी पिलाना चाहिए और फिर बाद में रोगी व्यक्ति को गर्म दूध पिलाना चाहिए। इस प्रकार से रोगी व्यक्ति का प्राकृतिक चिकित्सा से इलाज करने से वह जल्द ही होश में आ जाता है और उसका शरीर सामान्य हो जाता है।

जिगर का फोड़ा Liver abscess




          जिगर विद्रधि (जिगर का फोड़ा) के रोग में पहले रोगी के जिगर में सिकुड़न पैदा होती है और फिर उसमें फोड़ा निकल आता है। जिगर में उत्पन्न होने वाला यह फोड़ा जब पक जाता है तो रोग सांघातिक हो जाता है। इस रोग से पीड़ित रोगी का ऑपरेशन करने पर अधिकतर रोगियों की मृत्यु हो जाती है। इस रोग के उत्पन्न होने का मुख्य कारण अधिक मात्रा में नशीले पदार्थ जैसे- शराब, सिगरेट, तम्बाकू आदि का सेवन करना है। नशीले पदार्थों का सेवन करने वाले व्यक्ति अधिकतर शराब के साथ भारी भोजन करना पसन्द करते हैं जैसे- शराब के साथ मांस, पकौडे़ तथा अधिक तली व चटपटी चीजें। इस तरह शराब के साथ प्रयोग किये जाने वाले खाद्य-पदार्थ शरीर के लिए विषकारक हो जाते हैं। इससे व्यक्ति को कब्ज हो जाता है, जिसमें सड़न पैदा होकर पेट में गैस बनने लगती है। यह गैस ऊपर उठकर जिगर में पहुंच जाती है और उसमें विकार पैदा करती है। इस दूषित गैस के कारण जिगर सिकुड़ जाता है और फिर धीरे-धीरे उसमें घाव बनने लगता है। जिगर में घाव होने से इससे निकलने वाला दूषित द्रव खून में मिलकर खून को गन्दा कर देता है, जिससे शरीर कमजोर और रोगग्रस्त हो जाता है।

जल चिकित्सा द्वारा रोग का उपचार-

          जिगर के फोड़े के रोग में रोगी को कब्ज बनने वाले पदार्थ, गरिष्ठ (भारी) भोजन, अधिक तेल व जलन पैदा करने वाले भोजन नहीं करना चाहिए। इस रोग में रोगी को शराब, सिगरेट आदि पदार्थों का त्याग कर देना चाहिए। इसके बाद रोगी को पहले कब्ज दूर करने वाला उपचार करना चाहिए। फिर विभिन्न क्रिया द्वारा रोग का उपचार करना चाहिए-

          इस रोग से पीड़ित रोगी को हिप बाथ, सिज बाथ और होल बाथ प्रतिदिन करना चाहिए। इस रोग से पीड़ित रोगी को बीच-बीच में शरीर में मौजूद दूषित तत्वों को निकालने के लिए कभी-कभी वाष्पस्नान भी करना चाहिए। इसके अतिरिक्त जिगर रोग में रोगी को जिगर के ठीक ऊपर गीली मिट्टी का पुल्टिस या शीतल पट्टी का लपेट करने से रोग में लाभ होता है।

परहेज-

          इस रोग में रोगी को आवश्यकता के अनुसार उपवास अथवा अर्द्ध उपवास करना चाहिए। इस रोग के ठीक होने पर हल्का भोजन करना चाहिए।

झिनझिनियां रोग होने का कारण




•यह रोग उन व्यक्तियों को ज्यादा होता है जो कब्ज के कारण परेशान रहते हैं क्योंकि कब्ज के कारण स्नायु में किसी प्रकार का दोष उत्पन्न हो जाता है और वे सही तरीके से अपना कार्य नहीं कर पाते हैं जिसके कारण झिनझिनियां रोग हो जाता है।
•यह रोग उन व्यक्तियों को भी हो जाता है जिनकी पाचनशक्ति बहुत ज्यादा कमजोर होती है क्योंकि पाचन शक्ति खराब होने के कारण रोगी व्यक्ति जो कुछ भी खाता है उसका रस न बनकर उल्टा वह पेट में सड़ने लगता है जिससे पेट में एक प्रकार की विषैली गैस उत्पन्न होने लगती है, जो मस्तिष्क की नाड़ियों की ओर बढ़ने लगती है और वहां की नाड़ियों में दोष उत्पन्न कर देती है। मस्तिष्क स्नायुमण्डल का केन्द्र होता है, वह गैस वहां पहुंचकर उपद्रव शुरू करती है और उसके बाद वह गैस स्नायु द्वारा शरीर की नस-नस में व्याप्त होकर गड़बड़ी उत्पन्न कर देती है।
•यह रोग मस्तिष्क के स्नायु में सूजन हो जाने के कारण अधिक होता है।
झिनझिनियां रोग हो जाने के लक्षण:-

          इस रोग के कारण रोगी व्यक्ति के शरीर के कई अंगों में कपंकपी तथा अकड़न होने लगती है। रोगी व्यक्ति को दौरे पड़ने लगते हैं। इस रोग के कारण रोगी व्यक्ति के चेहरे की चमक खो जाती है। रोगी व्यक्ति के पैर के अंगूठे से लेकर सिर तक के समस्त स्नायु रोगग्रस्त तथा उत्तेजित हो जाते हैं।

झिनझिनियां रोग होने पर प्राकृतिक चिकित्सा से उपचार:-

•झिनझिनियां रोग से पीड़ित रोगी को सबसे पहले तब तक कटिस्नान करना चाहिए जब तक कि उसका शरीर ठीक प्रकार से ठंडा न हो जाए। रोगी व्यक्ति को कटिस्नान करते समय अपने टांगों, पैरों और ऊपर के शरीर को छोड़कर शेष शरीर को ठंडा नहीं करना चाहिए क्योंकि ऐसा करने से उन भागों में रक्त का संचारण कम हो सकता है इसलिए इन भागों को कपड़े से ढक कर रखना चाहिए। इस प्रकार से झिनझिनियां रोग का उपचार करने से यह रोग तुरन्त ही ठीक हो जाता है।
•झिनझिनियां रोग का प्राकृतिक चिकित्सा से उपचार करने के लिए रोगी व्यक्ति को कुछ दिनों तक फलों का रस (गाजर, सेब, चुकन्दर, अनानास, संतरा) पीकर उपवास रखना चाहिए। इसके बाद रोगी को फल, सब्जी और अंकुरित दालों का कुछ दिनों तक सेवन करना चाहिए। इसके फलस्वरूप दूषित द्रव्य जल्दी ही नष्ट हो जाते है और यह रोग ठीक हो जाता है।
•झिनझिनियां रोग से पीड़ित रोगी को भोजन में कॉफी, चाय, मैदा, रिफाइंड, चीनी, डिब्बाबंद खाद्य-पदार्थों का सेवन नहीं करना चाहिए।
•सोयाबीन को दूध में डालकर उसमें शहद मिलाकर प्रतिदिन सेवन करने से स्नायु में पड़ी सूजन ठीक हो जाती है। इससे झिनझिनियां रोग कुछ ही समय में ठीक हो जाता है।
•इस रोग से पीड़ित रोगी को प्रतिदिन पानी में नमक डालकर स्नान करने से लाभ होता है।
•झिनझिनियां रोग को ठीक करने के लिए सबसे पहले रोगी व्यक्ति को स्नायु का रोग ठीक करना चाहिए, जिसके लिए कई प्रकार के आसन, यौगिक क्रियाएं तथा स्नान हैं जिनको प्रतिदिन करने से यह रोग ठीक हो जाता है ये आसन तथा यौगिक क्रियाएं और स्नान इस प्रकार हैं- रीढस्नान, कटिस्नान, मेहनस्नान, योगासन, एनिमा क्रिया तथा प्राणायाम आदि।
•झिनझिनियां रोग से पीड़ित रोगी को प्रतिदिन सुबह के समय में नियमित रुप से कोई न कोई हल्का व्यायाम करना चाहिए जिससे स्नायु को शक्ति मिल सके और वे सही तरीके से अपना कार्य कर सकें। इस रोग से पीड़ित रोगी को सुबह तथा शाम के समय में खुली हवा में टहलना चाहिए इससे रोगी को बहुत अधिक लाभ मिलता है।
•इस रोग से पीड़ित रोगी को रोजाना कम से कम 7 से 8 घण्टे की नींद लेनी चाहिए।
•झिनझिनियां रोग से पीड़ित रोगी को प्राकृतिक चिकित्सा से उपचार कराते समय अपनी सभी मानसिक परेशानियों, भय, चिंता आदि को दूर कर देना चाहिए।
•यदि रोगी व्यक्ति किसी कार्य को करने में जल्दी थक जाता हो तो उसे वह कार्य करना छोड़ देना चाहिए।
•झिनझिनियां रोग से पीड़ित रोगी को प्रतिदिन शुष्कघर्षण आसन करना चाहिए तथा इसके बाद साधारण स्नान करना चाहिए। इससे यह रोग जल्दी ही ठीक हो जाता है।
•झिनझिनियां रोग से पीड़ित रोगी को झगड़ा-झंझट, वैवाहिक जीवन की असंगति, पारिवारिक क्लेश, आर्थिक कठिनाइयां, प्रेम सम्बन्धी निराशा, यौन सम्बन्धी कुसंयोजन, क्रोध, भय, घृणा आदि मानसिक कारणों से दूर रहना चाहिए और अपना उपचार प्राकृतिक चिकित्सा से कराना चाहिए।
जानकारी-

           इस प्रकार से झिनझिनियां रोग से पीड़ित रोगी का प्राकृतिक चिकित्सा से उपचार करने से उसका यह रोग जल्दी ही ठीक हो जाता है।

तात्कालिक कब्ज (मलावरोध) का त्वरित उपचार


खानपान या मौसम की प्रतिकूलता के कारण अनेकों बार मलत्याग की हाजत बनने पर भी शौचालय में स्वाभाविक मलविसर्जन की प्रक्रिया आसानी से पूर्ण नहीं हो पाती । मलद्वार पर कोई रुकावट महसूस होने पर या दबाव में कमी महसूस होने पर योगाभ्यास की एक सामान्य प्रक्रिया अग्निसार क्रिया से तत्काल समस्या का निवारण करें । इसके लिये खडे होकर दोनों घुटनों से ठीक उपर अपने दोनों हाथों को पैरों पर जमाकर एक गहरी सांस खींचकर वापस छोड दें और पेट की श्वासरहित अवस्था में अपने पेट को 20 से 30 बार तक अन्दर बाहर चलालें । फिर श्वास लेकर पुनः वापस छोड दें और फिर पेट को 20 से 30 बार अन्दर बाहर चलावें और इस प्रक्रिया को तीन बार पूरा करके पुनः  अपने स्थान पर बैठ जाएं ।

अगले एकाध मिनिट में 90% से अधिक अवसरों पर इस स्थिति से गुजरने वाले व्यक्ति अपने पेट को सामान्य रुप से साफ होता महसूस करेंगे । इटालियन शीट का प्रयोग करने वाले बैठे-बैठे भी इस प्रक्रिया को सम्पादित कर इसका लाभ ले सकते हैं ।

गुरुवार, 25 सितंबर 2014

वजन एवं खराब कोलस्ट्रोल घटाने हेतु घरेलु आयुर्वेदिक नुस्खा




अपने किचन से निम्न मसाले बताई मात्रा अनुसार ले :
1. भुना हुआ जीरा – 50 ग्राम,
2. मैथीदाना – 50 ग्राम, ayurvedic nuskha
3. धनिया – 50 ग्राम,
4. सौंफ – 50 ग्राम,
5. काली मीर्च – 25 ग्राम,
6. लेंडी पीपल – 25 ग्राम,
7. सौंठ – 25 ग्राम
8. दालचीनी – 25 ग्राम
खराब कोलस्ट्रोल (एल.डी.एल.) व वजन घटाने के लिए उपरोक्त आठों चीजें कुट-पीस कर पाउडर बना ले । फिर प्रतिदिन आधा चम्मच दोनो समय भोजन के बाद एक कप गरम पानी में घोल कर लें । यह अच्छा पाचक व विरेचक भी है । उक्त प्रयोग से वजन भी कम होता है ।

फूलगोभी खाते रहने से पेट निकल आता है बाहर




,फूलगोभी खाते रहने से पेट फूल जाता है या ज्यादा बाहर निकल आता है बाकी शरीर पेट के मुकाबले कम फूलता है नतीजतन शरीर बेडौल दिखाई पड़ता है।

फूल गोभी में निम्न तत्व पाये जाते हैं। जल, प्रोटीन, वसा ,फाइबर, कार्बोहाइड्रेट, कैल्सियम, थायेमिन, राइबोफ्लेबिन, नियासिन, विटामिन सी,।
      ** गोभी वात पैदा करती है। लेकिन ये कफ और पित्त की बदबू को दूर भी करती है.
      ** गोभी के पंचांग का काढा पीने से मूत्राघात मिटता है।
      ** इसके पत्तो का साग बनाकर खाइये अगर आपको खूनी बवासीर हो गया हो तो।
      ** गोभी के बारे में यूनानी चिकित्सा कहती है कि अगर ये ठीक से पच गयी है तो पेट और पसलियों के बीच में दर्द पैदा करती है।
      ** अगर आप चाहते हैं कि शराब का नशा आपको न चढ़े तो शराब पीने से पहले इसकी पकौड़ियाँ या सब्जी खा लीजिये।
      ** गोभी कामशक्ति को तो बढाती है मगर दिमाग को कमजोर कर देती है।
      ** गोभी स्वरभंग की सबसे अच्छी दवा है इसके पत्ते और तने का काढा बनाइये फिर उसमे शहद मिला कर पी लीजिये, किसी भी वजह से आई आवाज की खराबी दूर हो जायेगी।
      ** किसी का बुखार न दूर हो रहा हो तो उसे गोभी की जड़ का काढा बनाकर सुबह शाम पिला दीजिये।
      ** पेट दर्द के लिए गोभी बहुत फायदेमंद है।पेटदर्द में गोभी के पंचांग को चावल के पानी में पकाकर सुबह शाम सौ सौ ग्राम पी लीजिये।
      ** गोभी का रस पीने से खून साफ़ होता है .
      ** हड्डियों का दर्द दूर करने के लिए गोभी का रस और गाजर का रस बराबर मात्र में मिलाकर पीजिये।यह रस पीलीया में भी लाभ पहुंचाता है।
      ** खून की उल्टियां हो रही हो तो गोभी की सब्जी खाएं या कच्ची गोभी को सलाद के रूप में खा लीजिये।
     ** गोभी का काढा पेशाब की जलन भी दूर करता है।   
     ** गले की सूजन में गोभी के पत्तो का रस निकालिए। २ चम्मच रस और २ चम्मच पानी मिलकर १-१ घंटे पर पी लिजिये।                     

    बंद गोभी या पत्तागोभी अनेक पौष्टिक खनिज लवण और विटामिन का स्रोत है। इसमें प्रोटीन, वसा, नमी, फाईबर तथा कर्बोहाइड्रेट भी अच्छी मात्रा में होता है। पत्तागोभी में कैल्सियम, फास्फोरस, आयरन, कैरोटीन, थायमिन, राइबोफ्लेविन, नियासिन तथा विटामिन सी भी प्रचुर मात्रा में होता है। इसमें क्लोरीन तथा सल्फर भी पाया जाता है और अपेक्षाकृत आयोडीन का प्रतिशत भी अधिक होता है। सल्फर, क्लोरीन तथा आयोडीन साथ में मिल कर आँतों और आमाशय की म्यूकस परत को साफ कर देते हैं।
    ** अगर आपकी प्लेटलेट्स घट गयी हैं तो पूरी पत्ता गोभी उबाल कर पी लीजिये ,सुबह शाम १-१ ,दस पत्तागोभी का रस आपकी प्लेटलेट्स को बिलकुल सही मुकाम पर पहुंचा देगा। 

 .औषध प्रयोग से पूर्व किसी मान्यताप्राप्त हकीम या वैद्य से सलाह लेना आपके हित में उचित होगा

जटामांसी :सिर की ज्यादातर बीमारियों के लिए



    आइये  पहले इसके नामो के बारे में जानते हैं-
    हिंदी- जटामांसी, बालछड , गुजराती में भी ये ही दोनों नाम,तेल्गू में जटामांही ,पहाडी लोग भूतकेश कहते हैं और संस्कृत में तो कई सारे नाम मिलते हैं- जठी, पेशी, लोमशा, जातीला, मांसी, तपस्विनी, मिसी, मृगभक्षा, मिसिका, चक्रवर्तिनी, भूतजटा.यूनानी में इसे सुबुल हिन्दी कहते हैं.
    ये पहाड़ों पर ही बर्फ में पैदा होती है. इसके रोयेंदार तने तथा जड़ ही दवा के रूप में उपयोग में आती है. जड़ों में बड़ी तीखी तेज महक होती है.ये दिखने में काले रंग की किसी साधू की जटाओं की तरह होती है.
    इसमें पाए जाने वाले रासायनिक तत्वों के बारे में भी जान लेना ज्यादा अच्छा रहेगा---- इसके जड़ और भौमिक काण्ड में जटामेंसान , जटामासिक एसिड ,एक्टीनीदीन, टरपेन, एल्कोहाल , ल्यूपियाल, जटामेनसोंन और कुछ उत्पत्त तेल पाए जाते हैं.
    अब इस के उपयोग के बारे में जानते हैं :-
    मस्तिष्क और नाड़ियों के रोगों के लिए ये राम बाण औषधि है, ये धीमे लेकिन प्रभावशाली ढंग से काम करती है.
    पागलपन , हिस्टीरिया, मिर्गी, नाडी का धीमी गति से चलना,,मन बेचैन होना, याददाश्त कम होना.,इन सारे रोगों की यही अचूक दवा है.
    ये त्रिदोष को भी शांत करती है और सन्निपात के लक्षण ख़त्म करती है.
    इसके सेवन से बाल काले और लम्बे होते हैं.
    इसके काढ़े को रोजाना पीने से आँखों की रोशनी बढ़ती है.
    चर्म रोग , सोरायसिस में भी इसका लेप फायदा पहुंचाता है.
    दांतों में दर्द हो तो जटामांसी के महीन पावडर से मंजन कीजिए.
    नारियों के मोनोपाज के समय तो ये सच्ची साथी की तरह काम करती है.
    इसका शरबत दिल को मजबूत बनाता है, और शरीर में कहीं भी जमे हुए कफ  को बाहर निकालता है.
    मासिक धर्म के समय होने वाले कष्ट को जटामांसी का काढा ख़त्म करता है.
    इसे पानी में पीस कर जहां लेप कर देंगे  वहाँ का दर्द ख़त्म हो जाएगा ,विशेषतः सर का और हृदय का.
    इसको खाने या पीने से मूत्रनली के रोग, पाचननली के रोग, श्वासनली के रोग, गले के रोग, आँख के रोग,दिमाग के रोग, हैजा, शरीर में मौजूद विष नष्ट होते हैं.
    अगर पेट फूला हो तो जटामांसी को सिरके में पीस कर नमक मिलाकर लेप करो तो पेट की सूजन कम होकर पेट सपाट हो जाता है.

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बीमारी क्यों आती है?

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